क्या वाज़िद अली शाह के गिरते वैभव की वजह कलासक्त मिजाज था?

क्या वाज़िद अली शाह के गिरते वैभव की वजह कलासक्त मिजाज था?
Wikimedia

अवध के पाँचवे नवाब वाज़िद अली शाह


वाब वाज़िद अली शाह का नाम आते ही तमाम ख़ुशरंग-बदरंग ख़याल जेहन में उभर आते हैं। एक शासक के रूप में उनकी इतनी थुक्का- फ़जीहत की गई है कि लख़नऊ से आपका लगाव और जुड़ाव आपको शर्मसार कर देता है। ख़राब और गैरजिम्मेदार शासक के रूप में उन्होंने इतना नाम हासिल किया है कि जब भी आप उनके नाम के ज़िक्र से गुज़रते हैं एक लापरवाह आदमी की छवि आंखों के सामने तैर जाती है।

उनकी कुछ तस्वीरें मिलती हैं जिनको अगर ध्यान से देखा जाए तो उनमें एक किस्म का डिस्कम्फर्ट (discomfort) दिखता है। इस बाबत तफ्सील में जाने पर एक सवाल सर उठाता है कि उनको खाने-पीने, रहने-सहने की कोई तकलीफ़ तो थी नहीं फिर उनके वजूद में एक अलहदा किस्म की बेचैनी क्यों तारी है। जवाब ढूंढने पर नज़र एक ही जगह ठहरती है- ‘कला के विभिन्न आयामों के प्रति बेहद दीवानगी।ख़ासतौर से संगीत और नृत्य के प्रति उन्माद की हद तक दीवानापन उनके व्यक्तित्व में संतोष का अभाव लेकर आया।

यह भी पढ़ें : मौसिखी और अदब कि गहरी समझ रखने वाले आदिलशाही शासक

यह भी पढ़ें : कुतुबशाही दरबार के तीन कवि जिन्होने दकनी को दिलाया बडा स्थान

कलासक्त व्यक्तित्व

वाज़िद अली की बेचैनियों की वास्तविक वजह जो भी रही हो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वे कला प्रेमी थे और गज़ब के लिख्खाड़ भी। इस गुण की तस्दीक उनके 65 साला जीवन में लिखी गई सौ किताबों से होती है। उनको गद्य-पद्य, फ़ारसी-उर्दू की बेहतरीन जानकारी थी।

गज़ब की कल्पना शक्ति और सृजन का हुनर रखने वाला ये नवाब दरअसल योद्धा और प्रशासक की जगह कलाकार का दिल रखता था। शासक होने की वजह से कैफ़ियत यह रही कि वह अपनी इच्छाओं को मनमाफ़िक रंग दे सके। शासक के साधनों से अपने रचनाकार की ऊर्जा का पूरा-पूरा इस्तेमाल कर सके। लेखन की पद्य शैली के उरूज़ के दिनों में उन्होंने गद्य को भी तवज्जो दी। जब फ़ारसी अभिमान बनी बैठी थी उन्होंने उर्दू को सर आंखों पर बिठाया। ये छोटी बात थी।

नवाब कि तक़रीबन 40 किताबें छपीं। ज़्यादातर शाही प्रेस से आईं। इनमें मसनवी, रसिया, खिताबों का काव्यात्मक संकलन, संगीत जैसे विषयों पर लिखी पुस्तकें शामिल हैं। उनके बारे में दस्तावेजों में जो लिखत-पढ़त मिलती है उससे साफ़ है कि संगीत उनकी रूह में घुल गया था। परंपरागत हिन्दुस्तानी संगीत के साथ उन्होंने नए प्रयोग किये और उसे लोकप्रिय बनाने में कोई कसर छोड़ी। संगीत की तालीम देने वाले उनके परीखाना की खूब चर्चा मिलती है। इस चर्चा में नेकनामी और बदनामी दोनो शामिल हैं।

यह भी पढ़ें : सालों तक इतिहास के गुमनामी में कैद रहा नलदुर्ग का किला 

यह भी पढ़ें : एशिया का सबसे बडा मीर यूसुफ अली खान का सालारजंग म्युझियम

तारीख़--परिखाना

परीखाना नृत्य, संगीत और नाटक जैसी कलात्मक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने वाला प्रशिक्षण केंद्र सरीखा था। इसमें नृत्य और संगीत में अभिरुचि रखने वाली स्त्रियां प्रशिक्षण लेती थीं। इन अंतःवासी स्त्रियों कोपरीकहा गया है। परियों के अलावा उनके प्रशिक्षक, साजिंदे और इन विधाओं को अपनी सेवा देने वाले अन्य लोग भी परीखाना का हिस्सा थे।

वाजिद अली की आत्मकथात्मक मसनवी हुन्ज़--अख्तरमें ज़िक्र है कि परियां अपने अभिभावकों के साथ दिये गए मरों में रहती थीं। उनका आवासीय हिस्सा अलग और सुरक्षित था। बाहरी लोगों का प्रवेश निषेध था साथ ही सुरक्षा के लिए स्त्री सुरक्षा कर्मी भी रखी गईं थीं। इन्हेंतुर्किनकहा गया है जिससे संकेत मिलता है कि ये तुर्क महिलाएं होंगी।

वाज़िद अली ने फ़ारसी में लिखी अपनी तारीख--परिखानामें बताया है कि परियों की संख्या बढ़ने पर उनके रहने के लिए पूरब, पश्चिम और दख्खिन में कमरे बनवाये गए। इन कमरों की व्यवस्था ऐसी थी कि लखी दरवाज़ा कमरों की पूर्वी-पश्चिमी शृंखला के बीचो बीच पड़ता था। वाज़िद अली के नवाब की कुर्सी ंभालने के पहले तक परीखाना फलता फूलता रहा और शाह इसमें रमें रहे। अपनी पसंद की कई परियों से उनके मुताअ विवाह(तयशुदा तिथि तक शादी) के जिक्र है। अगर कोई परी मुताअ के बाद गर्भ से हुई तो उसके साथ बकायदा निक़ाह भी पढ़ा। चर्चा है कि उन्होंने 112 परियों से मुताअ किया।

बहरहाल ये सारा वाकया नवाबी का तख्त संभालने से पहले का है। लख़नऊ का नवाब बनने के तीसरे दिन ही परीखाना बंद कर दिया गया और नवाब साहब सियासी मसलों में मशगूल हो गए।

यह भी पढ़ें :मुग़ल हरम’ शायरी का मर्कज या वासना का केंद्र

यह भी पढ़ें :मुग़ल इतिहास में अनारकली का इतिहास क्या हैं?

मशहूर ठुमरी के रचियता

लखनवी भैरवी और ठुमरी को दिया गया वाज़िद अली शाह का योगदान काबिले-तारीफ है।बाबुल मोरा नइहर छूटो ही जाएके दर्द से हम सब वाकिफ़ हैं।तोसे सइयाँ मैं नहीं बोलूंकी चुहल मोहक है। संगीत परबनीऔरनाजोदो किताबें भी हैं जो उन्हें इस विधा का जानकार बताती हैं। शाह ने रहसभी लिखा साथ ही उसमें अभिनय भी किया। यह उनके लोक नाट्य शैली की जानकारी और लगाव का दस्तावेज है। उनका रहसभी छापे खाने तक पहुंचा। उसे हम पढ़ सकते हैं।

वाज़िद अली शाह ने शायरी की लगभग सभी विधाओं जैसे ग़ज़ल, मसनवी, मर्सिया, क़सीदा, रुबाई, क़ता में अपना कौशल दिखाया। फ़ारसी में उन्होंने अपना इश्क़नामालिखा। इसे उन्होंने 26 बरस की उमर में लिखना शुरु किया जब उन्हें बादशाहत हासिल किए लगभग दो साल गुज़रने को थे। यह नवाब साहब के जीवन का वह यथार्थ समेटे हुये है जिसकी सर्वाधिक चर्चा की गई।

उनकी कुंठा, कामुकता, इश्क़, मोहब्बत, स्त्रियों से संपर्क-संबंध, नृत्य-संगीत के प्रति लगाव का दस्तावेज है इश्क़नामा।इसमें उनकी मोहब्बत की तमाम दास्तान दर्ज़ है और हर-पहलू दर्ज़ है। वफ़ा, बेवफाई, छल, कपट, जालसाजी, फ़रेब हर्फ़ दर हर्फ़ पूरा रुक्का मिलता है। मोहब्बत में बेवफ़ाई का एक किस्सा सरफराज परी का है।

यह भी पढ़ें : औरंगजेब नें लिखी थीं ब्रह्मा-विष्णू-महेश पर कविताएं

यह भी पढ़ें : दास्ताने मुग़ल--आज़मसुनने का एक और आसिफ़

एक घायल प्रेमी 

रफ़राज़ उनकी ख़ास माशूक़ थी। जब उसकी बेवफ़ाई इन्तिहा पर पहुँच गई तो सदमें की वजह से नवाब वाजिद अली पागलों सी हरकत करने लगे। कभी वक़्त बे वक़्त जंगल की सैर तो कभी दरिया का रुख़। गहरा दुःख, बेचैनी, तन्हाई की तड़प और कुढ़न, घण्टों आईने में ख़ुद को निहारना दूसरी परियों से जासूसी करवाना और उन परियों का डाह और जलन में दीगर परियों की शिकायत करना, एक दूसरे की टोह में रहना बेबाकी से बयान किये गए हैं।

इश्क़नामामें वाज़िद अली शाह बयान करते हैं कि, “सरफ़राज़ परी के गम में उनका सीना चूने की भट्टी की मिसाल बन गया था। उसकी मोहब्बत वैसे कम होती जा रही थी लेकिन एक ख़लिश सी आंखों में रहती थी। एक रोज मैंने उसका हाथ पकड़ के रोक लिया और शिकायत आमेज़ अंदाज़ में कहा जाने- जां फ़िजूल ही तू मुझे मुब्तिल-- ग़म किये हुए है। यह कहाँ का तरीका है। किसी के दिल को अपने इश्क़ में मुब्तिला करके फिर बेमुरव्वती का सुलूक करे। तेरी इस बुरी हरकत का मुझे बड़ा मलाल है। अब भी कुछ नहीं गया, ख़ुदा के वास्ते अब भी सही रास्ते पर जा।’’

नवाब का ये बयान उनको एक घायल प्रेमी की तरह प्रस्तुत करता है। मोहब्बत में कैद जोड़े इस तरह की बातें करते हैं। ये आम है पर जो बात इसे ख़ास बनाती है वो ये है कि यहाँ कहने वाला ख़ुद नवाब है जो बेहद रसूख़दार है और उसकी प्रेमिका अपनी रोजी रोटी के लिए नवाब पर निर्भर है, परीखाना में संगीत की शिक्षा ले रही है।

यह भी पढ़ें : हिन्दुस्तान ने विदेशी हमलावरों को सिखाई तहजीब

यह भी पढ़ें :  बाबर भारत की विशेषताएं खोजने वाला मुघल शासक

नरम दिल इन्सान

नवाब का उससे किसी किस्म की जोर-जबरदस्ती करना मन को मोह लेता है। इस किस्से में प्रेम में विह्वल होकर नवाब वाज़िद अली शाह के ख़ुद को चोट पहुँचने का भी ज़िक्र मिलता है।

भले ही प्रेम का ये आवेग कुछ समय का रहा हो यह हमसे वाज़िद अली शाह को एक नरम दिल मुलायम न्सा की तरह मिलवाता है।

इश्क़नामाके बयानों में दरकती हुई नवाबियत और उसके गिरते हुए वैभव को महसूस किया जा सकता है। बेहद जटिल और मुश्किल समय में नवाब के चुनाव, प्राथमिकताओं, नादानियों, असावधनियों को इश्क़नामा में देखा जा सकता है।

अपने कामुक व्यक्तित्व, स्त्रियों के प्रति अतिरिक्त लगाव, झुकाव, भावुकता पर नियंत्रण रख पाने की वजह से आवाम के लाड़ले इस नवाब ने आवाम को ही भारी संकट में डाल अपने महबूब शहर को त्रासदियों के एक लंबे सिलसिले में झोंक दिया। संघर्ष की राह पर चलकर भी संभव है कि हश्र यही होता। लेकिन उस स्थिति में गरिमापूर्ण मूल्यांकन किया जाता।

नवाब वाज़िद अली शाह के व्यक्तित्व के नकारात्मक पक्षों की पूरी शिद्दत से कटु आलोचना की जानी चाहिये। लेकिन साथ ही कला और संस्कृति के प्रति उनके लगाव और योगदान को भी तवज्जो दी जानी चाहिये। बादशाहत मक्कारी मांगती है। वह ज़रूर वाज़िद अली शाह में कम रही होगी। इश्क़नामालिखकर वह अपनी बदनामी का दस्तावेज़ हमें खुद ही मुहैया करवा गए।

बनाम : नीलिमा पाण्डेय

(लेखिका लख़नऊ स्थित JNPG कॉलेज मे असोशिएट

प्रोफेसर हैं)

जाते जाते यह भी पढ़ें :

दकन के अस्मिता पुरुष छत्रपति शिवाजी और वली औरंगाबादी

हैदरअली ने बनाया था भारत का पहला जातिप्रथाविरोधी कानून

You can share this post!

author

फ़ेसबुकिया

इस कॉलम में फेसबुक से लिए लेख प्रकाशित होते हैं। जिसका मकसद पाठकों को नयी लेखकीय शैली और नये विषयों से रुबरू कराना हैं। यहां प्रकाशित होनेवाले सामग्री कि तथ्यांश की जिम्मेदारी ‘डेक्कन क्वेस्ट’ नही लेता हैं। बशर्ते इसके लेखक और आशय कि तथ्यता को परख़े बिना हम कोई लेख यहां प्रकाशित नही करते।