अय्याशी ले उड़ा ग्यारह महीनों का जहाँदार शाह का शासन

अय्याशी ले उड़ा ग्यारह महीनों का जहाँदार शाह का शासन
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दरबारीयों के साथ जहाँदार शाह


रवरी सन 1713 इसवीं को फर्रुखसियर ने दिल्ली का सिंहासन संभाला। वहाँ सबसे पहले जहाँदार शाह की खोज हुई, ताकि बादशाह उससे अपने सारे बदले चुका सके। दरअसल जहाँदार शाह परास्त होकर किसी तरह से गिरता-पड़ता बेगम लालकुँवर के साथ आसफुद्दौला असद खान के निवास पर दिल्ली पहुंचा था। जुल्फिकार खान ने उसका राज पुनर्जीवित करने का एक प्रयास और किया, जब उसने सुझाव दिया कि,

यदि जहाँदार शाह को दकन में या काबूल में भेज दिया जाए तो वह वहाँ एक दूसरी सेना खड़ी करने में सफलता प्राप्त कर सकता है.

पर आसफुदौल्ला इस मत से सहमत न थे। उन्होंने पिछले एक साल के जहाँदार शाह के शासन को निकट से देखा था, और समझ गए थे कि वह एक अयोग्य, मूर्ख और ऐय्याश शासक है। उसमें शाही गुणों का अभाव है और तार्किकता का कोई समावेश नहीं है। न ही वह समय पर उचित निर्णय लेना जानता है।

उनका तो आकलन यह था कि इस पूर्ववर्ती बादशाह को एक माह के गुजारे लायक धनराशि भी कहीं से नहीं मिल सकती थी। ऐसे में उचित निर्णय यही था कि उसे किले में लगातार निगरानी में रखा जाए। किस्मत की बात थी कि इस बीच की अवधि में जब उस पर निगरानी रखी जा रही थी, जहाँदार शाह सलीमगढ़ के उस महल में कैद रखा गया, जिसमें कभी दारा शिकोह की यादें बसी थीं।

इस प्रकार व्यवहारिक तौर पर जहाँदार शाह के ग्यारह माह पुराने ऐसे शासन काल का अंत हो गया था, जिसने इतिहास के पृष्ठों पर कोई सम्मानजनक स्थान प्राप्त नहीं किया था। पर, अभी उसे खुद बहुत बुरा समय देखना था।

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मुग़लों के साख पर बट्टा

अपने समय के विख्यात मुग़ल सम्राट आलमगीर औरंगज़ेब के पौत्र के रूप में जहाँदार शाह ने मुग़ल वंश की साख को जो बट्टा लगाया, वह न तो इतिहास में कभी कल्पना में रहा होगा, और न ही ऐसा कोई सोच सकता था। पर उसका कुप्रबंधन, य्याशी और अतार्किकता उसे ही ले डूबी।

उसके सारे दरबारी एक-एक कर खिलाफ हो चले थे। केवल वजीर जुल्फिकार अली साथ था, क्योकि असली शासन की कुंजी अभी भी उसके हाथ में थी। पर, आख़िरी समय इस वजीर ने ही अपने शहंशाह का ठिकाना नए बादशाह को बता दिया।

सलीमगढ़ का किला अब ऐसे ही कामों के लिए चर्चा में रहा करता था। पर नया बादशाह फर्रुखसियर जानता था कि इस वजीर की असलियत क्या है, इसलिए पहले उसी को दंड दिया गया। वजीर का गला घोट कर उसकी हत्या की गई।

उससे पहले जहाँदार शाह ने बेगम लालकुँवर से मिलने की इच्छा प्रकट की थी। उसका सम्मान किया गया। जब लालकुँवर आई तो वह अपने पति और प्रेमी के साथ लिपट कर रोती रही। वह उससे अलग नहीं होना चाहती थी। ऐसे माहौल में भी जहाँदार शाह ने कहा था,

जो बीत गया, उसे भूल जाओ, और खुदा का शुक्रिया अदा करो!

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पैरों में पड़ी बेड़ियाँ

पर खुदा उनकी तरफ कब था! जहाँदार शाह को तत्काल नहीं मारा गया। उसे धीरे-धीरे कड़े माहौल में रखा जाने लगा। अब पैरों में बेड़ियाँ भी डाली जाने लगीं। फिर एक दिन तय किया गया कि वह उसके जीवन का अंतिम दिन होगा। सो, फर्रुखसियर ने कुछ लोगों को इस घटनाक्रम को अंजाम देने के लिए भेजा। उन लोगों को देख कर ही लालकुँवर जहाँदार शाह के शरीर से चिपट गई। पर वे लोग नहीं माने। उसका गला घोटना आरंभ किया।

उसके शरीर के नाजुक अंगों पर चोटें पहुंचाई गईं। भारी बूट पहने हुए लोगों ने अनगिनत लातों से उसे मारा, पर वह मरा नहीं। लालकुँवर उससे चिपटी रही। तब उन्होंने उसे घसीट कर प्रेमी से अलग किया। अब सजा देने के काम के लिए नियत एक जल्लाद को बुलाया गया। पसीने में नहाए नाजिम यार मुहंमद खां ने पूछा,

अब जल्लाद का क्या काम बचा है?”

किसी ने कहा,

आने दो उसेबताते हैं!

हुक्म की तामीली के लिए जल्लाद आ गया था। पूछा,

क्या करना है?”

जब उसे बताया गया कि पूर्व बादशाह की हत्या करनी है, तो वह उसके शरीर को देख कर बोला,

क्या अब भी इसमें कुछ जान बची है?”

जब गौर से देखा गया, तो वाकई में जहाँदार शाह इस दुनिया से विदा ले चुका था। लालकुँवर दहाड़ें मार-मार कर रोती रही, पर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा।

पर जल्लाद का काम शेष था। उसे आदेश दिया गया,

इस नामाकूल का सर धड़ से अलग करो। बादशाह हुजूर की सेवा में पेश करना है!

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लाश को गलियों में घुमाया

हुक्म की तामीली हुई। जल्लाद ने एक झटके में सर धड से अलग कर दिया। इस कटे हुए सर को उसके सगे भतीजे शहंशाह फर्रुखसियर की सेवा में पेश किया गया, जो मुल्क के बेताज बादशाह की हैसियत में आ गया था।

बाद में शहंशाह के हुक्म से इस सर को हाथी के ऊपर एक बांस में टांग कर दिल्ली की गलियों में घुमाया गया, जहाँ यह नजारा देखने के लिए सैकड़ों व्यक्तियों की भीड़ इकट्ठा होती थी। उसका धड़ पीछे के हाथी पर रखा गया था। तीसरे हाथी पर अपने शाही अंदाज में बादशाह फर्रुखसियर बैठा था। ऐसे भी लोग थे जो एक इंसान का इतना बुरा हाल देख कर रो पड़ते थे।

पर यही उसकी नियति थी, जिसका निर्धारण उसके कर्मों ने किया था।

मुग़ल बादशाह जहाँदार शाह के ग्यारह माह के राज (1712–1713) में उसकी बेगम लालकुँवर ने जो ऊधम की अति की थी, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। क्या दिल्ली, क्या आगरा और क्या लाहौर, मुग़ल दरबार, किसी बादशाह और उसकी बेगम के इतने किस्से तो कभी नहीं बने कि लोग या तो चटखारे लेकर सुनें या आक्रोशित हो उठें। अगर आकलन किया जाए तो वह भी इस बादशाह के जीवन के पतन की बराबर या अधिक मात्रा की दोषी थी।

बाद में जहाँदार शाह के शरीर के अवशेषों को हुमायून के उसी मकबरे में दफन किया गया, जहाँ मुग़ल खानदान के लगभग 150 वंशजों की अस्थियाँ दफन हैं। हाँ, लालकुँवर की जान बख्श दी गई थी। उसे सुहागपुरा की उस बस्ती के पुनर्वास केंद्र में भेज दिया गया जहाँ शाही खानदान की बेवायें अपनी जिन्दगी के शेष दिन बिताने को अभिशप्त रहा करती थीं।

तैमूर के वंश के किसी भी व्यक्ति ने इस वंश को तब तक इतना कलंकित नहीं किया था, जितना जहाँदार शाह ने ग्यारह महीनों की अपनी बादशाहत के इस कार्यकाल में कर दिया था।

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राजगोपाल सिंह वर्मा

लेखक आगरा स्थित साहित्यिक हैं। भारत सरकार और उत्तर प्रदेश में उच्च पदों पर सेवारत। इतिहास लेखन में उन्हें विशेष रुचि है। कहानियाँ और फिक्शन लेखन तथा फोटोग्राफी में भी दखल।