रफ़ीउद्दौला जो रहा चंद महीनों का मुग़ल सम्राट

रफ़ीउद्दौला जो रहा चंद महीनों का मुग़ल सम्राट
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मुग़ल बादशाह शाहजहाँ द्वितीय या रफ़ीउद्दौल्ला की एक पेटिंग


गंभीर रूप से बीमार बादशाह रफी-उद-दरजात (Rafi ud-Darajat) का आखिरी वक्त आया था। ये देखकर सैय्यद भाई (Sayyid brothers) विचार करने लगे कि बन्दी शहजादों में से किसको समय के गर्त से निकाल कर अब गद्दी पर बैठाया जाए।

इस बीच बीमार बादशाह ने सैय्यद बंधुओं से अनुरोध किया कि यदि वे उसके जीवित रहते ही उसके बड़े भाई रफीउद्दौला को गद्दी पर बैठाकर उसके नाम के सिक्के ढ़लवा दें तो वह ज्यादा अहसानमंद होगा। सैय्यद बंधुओं को इसमें किसी प्रकार की आपत्ति नहीं थी।

उन्हें तो गद्दी पर मुग़ल वंश के किसी भी शाहजादे को बैठाकर सत्ता पर अपना नियंत्रण बनाये रखना था। 4 जून सन 1719 ईसवीं को जब रफी-उद-दरजात का निधन हो गया। इसके फौरन तीन दिन बाद उसके बड़े भाई रफीउद्दौला (Rafi ud-Daulah) को सिंहासन पर बैठा दिया गया। वह शाहजहाँ द्वितीय (Shah Jahan II) की उपाधि के साथ सिंहासन पर बैठा। यह बादशाह अपने भाई रफी-उद-दरजात से डेढ़ साल बड़ा था।

सिंहासन पर बैठने के बाद रफीउद्दौला के नाम का खुतबा पढ़ा गया और सिक्के ढ़ाले गए। नये बादशाह को 21 तोपों की सलामी दी गयी। इस सम्मान के अतिरिक्त इस बादशाह के हाथ में कुछ भी नहीं था। उसके ऊपर हर वक्त सैय्यद अब्दुल्ला ख़ान के आदमियों की नजर रहती थी।

महल में और महल के बाहर, दरबार के वक्त ही नहीं बल्कि उसे हर पल अपने पर एक शिकंजा नजर आता था।  स्थिति इतनी गंभीर थी कि बादशाह को अपने भोजन व कपडों के लिये भी सैय्यद बंधुओं के खास हिम्मत ख़ान से कहना पड़ता था। उसे किसी अमीर से बात करने या शिकार पर जाने की अनुमति नहीं थी। जब कभी उसे बाहर जाना होता था अथवा किसी से मुलाकात करनी होती थी तो सैय्यद भाइयों के आदमी साथ रहते थे।

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एक बार दिल्ली से बाहर निकला

रफीउद्दौला के शासनकाल की मुख्य घटना मारवाड़ के राजा अजित सिंह द्वारा मृत बादशाह फर्रूखसियर को डोलाप्रथा से ब्याही अपनी पुत्री इंद्रकुंवर को फिर से मारवाड़ ले जाना था।  मुग़ल वंश में ऐसा पहली बार हुआ था। इंद्रकुंवर अपने साथ जवाहरात व नगद के रूप में एक करोड़ से अधिक की संपत्ति जोधपुर (पिता की राजधानी) ले गयी थी।

उसने इस्लाम त्यागकर फिर से हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया था। इस घटना से उस वक्त कट्टर मुसलमानों में गहरा आक्रोश उमड़ पड़ा था परंतु परिस्थितियों की नाजुकता को मद्देनजर रखते हुए सैय्यद भाइयों ने सब कुछ अनदेखा ही नहीं किया बल्कि अजित सिंह को अहमदाबाद तथा अजमेर की सूबेदारी भी इस कठपुतली बादशाह से मंजूर करवा दी।

बादशाह रफीउद्दौला अपने शासनकाल में मात्र एक बार दिल्ली से बाहर निकल सका था। वह भी तब, जब आगरा में सैय्यद बंधुओं को निकू सियर के विरूद्ध आक्रमण के दौरान चेहरा बादशाह का चेहरा दिख़ाने हेतु उसकी आवश्यकता थी।

बादशाह रफीउद्दौला उर्फ शाहजहाँ द्वितीय का शासनकाल मात्र तीन माह कुछ दिन का ही रहा। अपने सिंहासनारोहण के पश्चात वह स्वयं पर लगी बंदिशों के कारण बेहद तनाव में रहता था। 17 सितम्बर सन 1719 ईसवीं को मस्तिष्क विकृति एवं तीव्र दस्त के कारण उसकी मृत्यु हो गयी। कुछ लोग उसकी मौत की वजह क्षय रोग को भी बताते हैं।

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निकू सियर बना बादशाह

जिस वक्त रफीउद्दौला दिल्ली में गद्दी पर था, उसी दौरान आगरा में आमेर (जयपुर) के राजा जयसिंह के प्रोत्साहन देने पर मित्रसेन नागर नामक एक प्रभावशाली ब्राह्मण ने शहज़ादा मुहंमद अकबर के पुत्र तथा औरंगजेब के पौत्र निकू सियर के बादशाह होने की घोषणा करते हुए उसके नाम का खुतबा पढ़वा दिया था।  

निकू सियर आगरा के किले में लम्बे समय से नजरबंद था। आगरा में गुप्त रूप से उसके नाम के सिक्के ढ़ाले गए तथा उसे तोपों की सलामी दी गई। आगरा में निकू सियर के गद्दी पर बैठने का समाचार पाकर हुसैन अली ख़ान ने फौरन अपने विश्वस्त हैदरकुली ख़ान को सेना सहित आगरा रवाना किया और पीछे से खुद 25 हजार सैनिकों सहित आगरा की ओर चल दिया। 

मेर का राजा जयसिंह तथा प्रभावशाली अमीर छबीलाराम नागर पर्दे के पीछे से निकू सियर का समर्थन कर रहे थे। राजा जयसिंह जयपुर से 60 किलोमीटर आगे बढ़कर मार्ग में कड़ा (इलाहाबाद के नजदीक) से आने वाले छबीलाराम नागर की राह देख रहा था, लेकिन छबीलाराम को आने में थोड़ी देरी हुयी। तभी स्थिति की गंभीरता को भाँपकर सैय्यद अब्दुल्ला ख़ान मारवाड़ के शासक अजित सिंह व 30 हजार सैनिकों को लेकर आगरा को चल दिया। यह देख जयसिंह अपनी राजधानी की तरफ वापस लौट गया।

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बादशाह बंदी बना

सैय्यद बंधुओं ने अजित सिंह के साथ मिलकर आगरा के किले पर घेरा डाल दिया। किले पर भारी तोपों से गोले बरसाये गए जिससे किले में भीतर कुछ भवन धराशायी हो गए तथा वहाँ त्राहि-त्राहि मच गयी। किले पर घेरा तीन दिन तक पड़ा रहा।

अपनी कमजोर स्थिति का ज्ञान होने तथा राजा जयसिंह व छबीलाराम नागर के मदद के लिए न पहुँचने पर निकू सियर ने अपने विश्वासपात्र मुंशी नथमल को घेरा डालने वालों से संपर्क करने को कहा पर जब नथमल किले से निकला तो उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

नथमल के पास से बरामद थैले में कई ऐसे खत मिले जो घेरा डालने वाले कई अमीरों ने निकू सियर को लिखे थे। पर सैय्यद बंधुओं ने इस बात पर पर्दा डालना ही उचित समझा, क्योंकि मामले की जांच-पड़ताल होने पर परस्पर फूट पड़ने की संभावना थी।

वैसे किले के अंदर खाद्य सामग्री की भारी कमी थी। रक्षकों को अपनी पराजय स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही थी। ऐसे में जब घेरा डालने वालों ने किले के लोगों की संपत्ति, जीवन व सम्मान की सुरक्षा की गारंटी दी तो किले में बंद लोगों ने 12 अगस्त सन 1719 ईसवीं को किले का कब्जा आक्रमणकारियों को सौंप दिया। परिणास्वरूप निकू सियर व उसके सहायक बंदी बना लिए गये।

वास्तव में इस बवाल का प्रणेता मित्रसेन नागर था। उसने खुद को शत्रु के हाथों में सौंपने से बेहतर मौत को गले लगाना उचित समझा और एक खंजर से खुदकुशी कर ली। निकू सियर को बंदी बनाकर दिल्ली स्थित सलीमगढ़ भेज दिया गया, जहाँ 11 मार्च सन 1723 ईसवीं में उसकी मौत हो गयी।

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आगरा का ख़जाना

आगरा मुग़लों की द्वितीय राजधानी के रूप में जाना जाता था। वहाँ का खजाना अभी तक अछूता था। यहाँ एक स्थान पर सिकंदर लोदी के वक्त के 35 लाख मूल्य के सिक्के मिले। एक अन्य स्थान से शाहजहाँ कालीन 78 लाख रूपया मिला।  

यहीं से अकबर के वक्त की 10 हजार सोने की मोहरों के साथ हिसाब-किताब के कागजात भी मिले जिनसे पता चला कि औरंगजेब ने यह खजाना अपने मामा शाहिस्ते ख़ान के सुपुर्द किया था। उसके बाद फिर औरंगजेब कभी दक्षिण से उत्तर की ओर लौट ही नहीं सका था। वहीं 3 मार्च 1707 ई। को उसकी मौत हो गयी थी।

बहादुरशाह व जहाँदारशाह के वक्त में इस खजाने का पता नहीं चला था। यहाँ एक बक्से में मोतीजड़ित नूरजहाँ का शाल मिला। यहीं से जहाँगीर की तलवार व एक रत्नजड़ित चादर भी मिली जिसे शाहजहाँ के समय में प्रत्येक शुक्रवार को मुमताज महल की कब्र पर डाला जाता था। खाफी ख़ान के अनुसार इस समस्त संपत्ती का मूल्य उस वक्त 3 करोड़ के करीब रहा था।

सैय्यद हुसैन अली ख़ान ने यह सारा माल अपने पास रख लिया। इस बात को लेकर उसकी अपने बड़े भाई सैय्यद अब्दुल्ला ख़ान तक से तनातनी हो गयी थी। बाद में सैय्यद हुसैन अली ख़ान ने इसमें से बमुश्किल 20 लाख रूपया अपने भाई सैय्यद अब्दुल्ला ख़ान को दिया।

वैसे रफ़ीउद्दौला 23 साल की उम्र में अपने भाई की तरह यह क्षय रोग का शिकार था। इसी बिमारी में सितम्बर 1799 की एक सुबह वह मर गया। कहते हैं, वह यूँ भी शारीरिक और मानसिक रूप से एक शासक के रूप में फिट नहीं था। इस तरह तीन महीने शक्तिशाली मुग़ल राजवंश के एक और बादशाह का काल के अतित में समा गया।

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author

राजगोपाल सिंह वर्मा

लेखक आगरा स्थित साहित्यिक हैं। भारत सरकार और उत्तर प्रदेश में उच्च पदों पर सेवारत। इतिहास लेखन में उन्हें विशेष रुचि है। कहानियाँ और फिक्शन लेखन तथा फोटोग्राफी में भी दखल।