इतिहास को लेकर आप लापरवाह नहीं हो सकते !

इतिहास को लेकर आप लापरवाह नहीं हो सकते !
RUPAK DE CHOWDHURI / REUTERS

भारत की प्राचीन परंपरा - कोलकाता स्थित दुर्गा पूजा पंडाल में दहन से पहले रावण प्रतिमा


किताबीयत : वाईस ऑफ डिसेंट 

सहमतियां कभी बग़ावत में नहीं बदल सकीं। जिस व्यवस्था के सामने खड़ी हुई हैं, आगे चल कर उसी का हिस्सा हो जाती हैं। हर सभ्यता में असहमति की अपनी परंपरा रही है। एक सीधी रेखा में चलने वाली परंपरा नहीं रही है।

आप इसे सिर्फ इस रुप में नहीं समझ सकते कि सत्ता के सामने कोई व्यक्ति खड़ा है। बल्कि सत्ता भी समाज में असहमतियों की रचना करती है। जब वह हम बनाम वे का विभाजन करती है या पहले से मौजूद ऐसे विभाजन को संरक्षण देती हैं। एक और उदाहरण देता हूं। आपने मौजूदा सरकार का विरोध कर दिया तो न्यूज़ चैनल आपको अर्बन नक्सल कहेगा। यानी वह आपको अन्य (OTHER) की तरफ धकेल देगा। आपको अलग कर देगा।

अक्सर समाजशास्त्रीय और राजनीतिक विश्लेषणों में आप इसे अन्य या Oothers के रूप में लिखा-बोला जाता है। अन्य और असमहतियों में रिश्ता भी दिखता है और नहीं दिखता है। समाज में किसी की पहचान अन्य के रुप में सिर्फ इसलिए नहीं की जाती वह विरोध के स्वर उठा रहा है बल्कि विरोध न करने पर भी वह अन्य की तरफ धकेला जाता है।

90 साल की उम्र में इतिहासकार रोमिला थापर अपने नए निबंध DISSENT में असहमति की भारतीय परंपरा का यात्रा करा रही हैं। उनका तर्क है कि भारतीय परंपरा में इस अन्य के विभाजन के कई प्रमाण मिलते हैं। विपक्ष के नज़रिए को समाज किस रूप में दर्ज करता है, मान्यता देता है उसकी तस्वीर नज़र आती है।

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हम बनाम वे

भारतीय दर्शन में इसे पूर्व-पक्ष, प्रतिपक्ष और सिद्धान्त के रुप में अभिव्यक्त किया गया है। किसी किसी दर्शन में इसका और भी महीन विभाजन मिलता है। बौद्ध ग्रंथों में विवाद का ज़िक्र आता है। विवाद किसी व्यक्ति की अपनी कमज़ोरियों के कारण होता है या भी धम्म या विनय को न समझ पाने के कारण होता है। तो आप देख पाते हैं कि विवाद का होना कई बातों पर निर्भर करता है। सिर्फ विचार के विरोध से विवाद नहीं होता है। विरोध को कई तरह से देखा जाता है।

प्राचीन भारत में जैसे-जैसे धर्म संगठित होने की दिशा में बढ़ता है, उसकी संस्थाएं आकार लेने लगती हैं, तब धर्म किसी की निजी आस्था से आगे बढ़ कर समाज के नियमों को तय करने लगता है। सत्ता-संरचना में ढलने लगता है।

जैसे ही धर्म के नियम सूचीबद्ध होने लगते हैं, रूढ़ीवाद का प्रसार होने लगता है। और तभी इसे चुनौती भी मिलती है। असहमति के बिन्दु उभरने लगते हैं। जो असहमति के समर्थन में आएंगे, उन्हें संगठित धर्म के दायरे से बाहर किया जाने लगेगा।

अंग्रेज़ों के आने के पहले ही भारतीय परंपरा में संगठित धार्मिक संस्थाओं ने अन्य का निर्माण शुरू कर दिया था। इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। लेकिन हमेशा अन्य का निर्माण असहमति से नहीं होता है। कई बार असहमति के बग़ैर भी अन्य का निर्माण होता है।

इतिहास के अलग-अलग दौर में हम बनाम वे लोगों का विभाजन क्रम बदलता रहता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस समूह को राज्य सत्ता और अर्थतंत्र का संरक्षण हासिल है।

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पौराणिक परंपरा को संरक्षण

गुप्त काल तक श्रमण यानी बौद्ध, जैन, लोकायत, चार्वाक वगैरह हावी होते हैं। इन्हें राज्य से संरक्षण मिलता है। लेकिन गुप्त काल के बाद दूसरा दौर आता है तो पौराणिक हिन्दू धर्म को संरक्षण मिलने लगती है। श्रमण परंपरा की पहचान अन्य के रूप में होने लगती है और उसका पतन होने लगता है।

इसके बाद बौद्ध धर्म दक्षिण पूर्व एशिया की तरफ चला जाता है और उसके साथ-साथ पौराणिक हिन्दू धर्म भी लेकिन वहां बौद्ध धर्म को संरक्षण मिल जाता है। भारत में पौराणिक हिन्दू परंपरा को संरक्षण और विस्तार मिलने लगता है। जब जो सत्ता में होता है वह अपने सामने एक अन्य का निर्माण करता ही है।

कौटिल्य तो आपातकाल में धार्मिक संस्थाओं के पास जमा धन को ज़ब्त कर लेने की वकालत करते हैं। कल्हण की राजतरंगिनी में इसके कई प्रमाण मिलते हैं। ईसवी सन की पहली सदी में कश्मीर के कई राजा अपनी वित्तीय शक्ति का इस्तमाल करते हैं और मंदिरों की संपत्ति ज़ब्त कर लेते हैं। मंदिरों को लूट लेते हैं।

11 वीं सदी में हर्षदेव ने तो मंदिरों पर भीषण हमले किए थे। आपातकाल के वक्त मंदिर और उसकी संपत्ति अन्य के रूप में देखी जाती है।

रोमिला कहती हैं कि इस Other की पहचान अलग अलग समय में बदलती रहती है। चार्वाक भी असहमति की परंपरा की स्थापना करते हैं जिसे कभी पर्याप्त संरक्षण नहीं मिलता है। साथ ही एक समय में भारत में दो तरह की धार्मिक मुख्यधारा चल रही है। गुप्तकाल के आस-पास का यह समय है। इसी तरह की दो तरह की मुख्यधाराओं का निर्माण आगे चल कर मध्यकाल में होता है। इसके बीच कई रोचक किस्से इतिहास के हैं जिससे हमारी समझ बेहतर होती है।

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ऐतिहासिक समझ की स्थापना

जब भारत आज़ाद हुआ था तब रोमिला थापर 15-16 साल की रही होंगी। आज़ाद भारत के दौर के सपने उनकी आंखों में आज भी बचे होंगे। तभी तो वह भारतीय पंरपराओं की ऐतिहासिक समझ की स्थापना के लिए 90 साल की उम्र में भी लिख रही हैं।

उनका कहना है कि इतिहास को लेकर आप लापरवाह नहीं हो सकते। आलसी नहीं हो सकते। आपको तथ्यों के साथ रिश्ता दिखाना होता है। जहां प्रमाण नहीं हैं वहां प्रश्नों का सहारा लेना होता है न कि एक अंतिम जवाब के रूप में थोपा जाता है।

पढ़ना और समझना बहुत जटिल प्रक्रिया है। तुरंत किसी पोस्ट के बाद लाइक और कमेंट से उसकी लोकप्रियता का अंदाज़ा लगाना इस प्रक्रिया को ख़त्म कर देता है। पाठक के पास वक्त नहीं है। पाठक के पास किताब नहीं है। समाज में सूचनाओं का संस्कार बदल चुका है।

इतिहासकार के पास बदलने की यह छूट नहीं है। इसलिए वह जब लिखता है तो सारे संदर्भों को देता है। अपने आप को आलोचना के लिए उपस्थित करता है। मगर किसी के पास वक्त कहां है। आप बेशक इस किताब को पढ़ें। काफी समझ साफ होती है। हिन्दी में भी इसका अनुवाद हो रहा है लेकिन रोमिला थापर की अंग्रेज़ी काफी पठनीय है। तरल है। प्रमाणिकता है।

लेखक रवीश कुमार लोकसंवादक पत्रकार हैं

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किताब का नाम : Voices of Dissent : An Essay 

लेखिका : प्रो. रोमिला थापर

पन्ने : 164

भाषा : अंग्रेजी

प्रकार : वैचारिक निबंध (2020)

कीमत : 499 रुपये

प्रकाशक : Seagull Books

ऑनलाईन : Voices of Dissent : An Essay 

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