साहिर लुधियानवी : फिल्मी दुनिया के गैरतमंद शायर

साहिर लुधियानवी : फिल्मी दुनिया के गैरतमंद शायर

साहिर लुधियानवी एक तरक्की पसंद शायर थे और अपनी गजलों, नज्मों से पूरे मुल्क में उन्हें खूब शोहरत मिली। अवाम का ढेर सारा प्यार मिला। साहिर साल 1949 में सपनों की नगरी मुंबई आ गए। माया नगरी में जमना उनके लिए आसान काम नहीं था।

संघर्ष के इस दौर में आजीविका के लिए साहिर ने कई छोटे-मोटे काम किए। साहिर की लिखावट बहुत अच्छी थी। इसका फायदा उन्हें यह मिला कि निर्माता, फिल्म की पटकथा को उनसे लिखवाने लगे, ताकि हीरो-हीरोईन उसे सही तरह से पढ़ सकें।

पटकथा के पेजों के हिसाब से साहिर अपना मेहनताना लेते थे। इस काम का फायदा उन्हें यह हुआ कि वे कई फिल्म निर्माताओं के सीधे संपर्क में आ गए। मौका देखकर वे उन्हें अपनी रचनाएं भी सुना दिया करते। आखिरकार वह दिन भी आया, जब उन्हें फिल्मों में गीत लिखने का मौका मिला।

आजादी की रात’ (साल 1949) वह फिल्म थी, जिसमें उन्होंने पहली बार गीत लिखे। इस फिल्म में उन्होंने चार गीत लिखे। लेकिन अफसोस ! न तो ये फिल्म चली और न ही उनके गीत पसंद किए गए।

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एसडी और साहिर की सुपर हिट जोड़ी

बहरहाल फिल्मों में कामयाबी के लिए उन्हें ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा। साल 1951 में आई नौजवानउनकी दूसरी फिल्म थी। एस.डी. बर्मन के संगीत से सजी इस फिल्म के सभी गाने सुपर हिट साबित हुए। खास तौर पर लता मंगेशकर की सुरीली आवाज में ठंडी हवाएं, लहरा के आएं...’’ गीत आज भी फिल्म संगीत के चाहने वालों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

नौजवानफिल्म के गीतों की कामयाबी के बाद, फिर नवकेतन फिल्मस की फिल्म बाजी’ (साल 1952) आई, जिसने साहिर को फिल्मी दुनिया में बतौर गीतकार स्थापित कर दिया। इत्तेफाक से इस फिल्म का भी संगीत एसडी बर्मन ने ही तैयार किया था। आगे चलकर एसडी और साहिर की जोड़ी ने कई सुपर हिट फिल्में दीं।

जाल’ (साल 1952), ‘टैक्सी ड्राइवर’ (साल 1954), ‘हाउस नं. 44’ (साल 1955), ‘मुनीम जी’ (साल 1955), ‘देवदास’ (साल 1955), ‘फंटूश’ (साल 1956), ‘पेइंग गेस्ट’ (साल 1957) और प्यासा’ (साल 1957) वे फिल्में हैं, जिनमें साहिर और एसडी बर्मन की जोड़ी ने कमाल का गीत-संगीत दिया है।

फिल्म प्यासाको भले ही बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी न मिली हो, लेकिन इसके गीत खूब चले। ये गीत आज भी इसके चाहने वालों के होठों पर जिन्दा हैं। फिल्मी दुनिया में साहिर को बेशुमार दौलत और शोहरत मिली। एक वक्त ऐसा भी था कि उन्हें अपने गीत के लिए पार्श्व गायिका लता मंगेशकर से एक रूपया ज्यादा मेहनताना मिलता था।

हिन्दी फिल्मों में साहिर लुधियानवी ने दर्जनों सुपरहिट गाने दिए। उनके इन गानों में भी अच्छी शायरी होती थी। साहिर के आने से पहले हिन्दी फिल्मों में जो गाने होते थे, उनमें शायरी कभी-कभार ही देखने में आती थी। लेकिन जब फिल्मी दुनिया में मजरूह सुल्तानपुरी, कैफी आजमी और साहिर आए, तो फिल्मों के गीत और उनका अंदाज भी बदला।

गीतों की जबान बदली। हिन्दी, उर्दू से भाषा से इतर यह गीत हिन्दोस्तानी जबान में लिखे जाने लगे। इश्क-मोहब्बत के अलावा फिल्मी नगमों में समाजी-सियासी नजरिया भी आने लगा। इसमें सबसे बड़ा बदलाव साहिर ने किया। अपने शायराना गीतों को फिल्मों में रखने के लिए उन्होंने कई बार फिल्म प्रोड्यूसर और डायरेक्टर से लड़ाई भी की।

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एक गैरतमंद शायर

अपने फिल्मी गीतों की किताब गाता जाए बंजाराकी भूमिका में साहिर लिखते हैं, ‘‘मेरी हमेशा यह कोशिश रही है कि यथा संभव फिल्मी गीतों को सृजनात्मक काव्य के नजदीक ला सकूं और इस तरह नए सामाजिक और सियासी नजरिये को आम अवाम तक पहुंचा सकूं।’’

साहिर की ये बात सही भी है। उनके फिल्मी गीतों को उठाकर देख लीजिए, उनमें से ज्यादातर में एक विचार मिलेगा, जो श्रोताओं को सोचने को मजबूर करता है। ‘‘वो सुबह तो आएगी..’’ (फिर सुबह होगी), ‘‘जिन्हें नाज है हिंद पर.....’’, ‘‘ये तख्तों ताजों की दुनिया, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो....’’ (प्यासा), ‘‘तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा......’’ (धूल का फूल), ‘‘औरत ने जन्म दिया मर्दों को....’’ (साधना) आदि ऐसे उनके कई गीत हैं, जिसमें जिन्दगी का एक नया फलसफा नजर आता है।

ये फिल्मी गीत अवाम का मनोरंजन करने के अलावा उन्हें शिक्षित और जागरूक भी करते हैं। उन्हें एक सोच, नया नजरिया प्रदान करते हैं। एक अच्छे लेखक, शायर की पहचान भी यही है।

साहिर एक गैरतमंद शायर थे। अपने स्वाभिमान से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। फिल्मी दुनिया में अब तो ये जैसे एक रिवायत बन गई है कि पहले संगीतकार गीत की धुन बनाता है, फिर गीतकार उस धुन पर गीत लिखता है। पहले भी ज्यादातर संगीतकार ऐसा ही करते थे, लेकिन साहिर लुधियानवी अलग ही मिट्टी के बने हुए थे। वे इस रिवायत के बरखिलाफ थे।

अपने फिल्मी करियर में उन्होंने हमेशा गीत को धुन से ऊपर रखा। पहले गीत लिखा और फिर उसके बाद उसका संगीत बना। उनके फिल्मी करियर में सिर्फ एक गीत ऐसा है, जिसकी धुन पहले बनी और गीत बाद में लिखा गया। ओ.पी. नैय्यर के संगीत निर्देशन में फिल्म नया दौरका ‘‘मांग के साथ तुम्हारा, मैंने मांग लिया संसार...’’ वह गीत है।

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मेहनतकशों, कामगारों की आवाज

अपनी फिल्मी मसरुफियतों की वजह से साहिर अदब की ज्यादा खिदमत नहीं कर पाए। लेकिन उन्होंने जो भी फिल्मी गीत लिखे, उन्हें कमतर नहीं कहा जा सकता। उनके गीतों में जो शायरी है, वह बेमिसाल है। जब उनका गीत ‘‘वह सुबह कभी तो आएगी....’’ आया, तो यह गीत मेहनतकशों, कामगारों और नौजवानों को खासा पसंद आया।

इस गीत में उन्हें अपने जज्बात की अक्काशी दिखी। मुंबई की वामपंथी ट्रेड यूनियनों ने इस गीत के लिए साहिर को बुलाकर, उनका सार्वजनिक अभिनंदन किया और कहा, ‘‘यह गीत हमारे सपनों की तस्वीर पेश करता है और इससे हम बहुत उत्साहित होते हैं।’’

जाहिर है कि एक गीत और एक शायर को इससे बड़ा मर्तबा क्या मिल सकता है। ये गीत है भी ऐसा, जो लाखों लोगों में एक साथ उम्मीदें जगा जाता है,

वह सुबह कभी तो आएगी

बीतेंगे कभी तो दिन आखिर यह भूख के और बेकारी के

टूटेंगें कभी तो बुत आखिर, दौलत की इजारेदारी के

इस गीत के अलावा फिल्म नया दौरके एक और गीत में वे मेहनतकशों को खिताब करते हुए लिखते हैं,

साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना,

माटी से हम लाल निकालें, मोती लाएं जल से,

जो कुछ इस दुनिया में बना है, बना हमारे बल से

आजादी के बाद मुल्क के सामने अलग तरह की चुनौतियां थीं। इन चुनौतियों का सामना करते हुए साहिर ने कई अच्छे गीत लिखे। लेकिन उनके सभी गीतों में एक विचार जरूर मिलेगा। जिस विचार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी, उसी विचार को उन्होंने अपने गीतों के जरिए आगे बढ़ाया।

उनके एक नहीं, कई ऐसे गीत है, जिसमें उनकी विचारधारा मुखर होकर सामने आई है। फिल्मी दुनिया में भी रहकर उन्होंने अपनी विचारधारा से कभी समझौता नहीं किया। मेहनतकशों और वंचितों के हक में हमेशा साथ खड़े रहे।

साहिर को फिल्मों में जहां भी मौका मिला, उन्होंने अपनी समाजवादी विचारधारा को गीतों के जरिए आगे बढ़ाया। आज फिल्मों में इस तरह के गीतों का तसव्वुर भी नहीं कर सकते।

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सांप्रदायिकता के कड़े विरोधी

साहिर लुधियानवी साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के साथ-साथ सांप्रदायिकता के भी कड़े विरोधी थे। अपनी नज्मों और फिल्मी गीतों में उन्होंने सांप्रदायिकता और संकीर्णता का हमेशा विरोध किया। अपने एक गीत में वे देशवासीयों को एक प्यारा पैगाम देते हुए लिखते हैं,

तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा

इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा

मालिक ने हर इन्सान को इन्सान बनाया

हमने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया

कुदरत ने तो बख्शी थी हमें एक ही धरती

हमने कहीं भारत, कहीं ईरान बनाया

जो तोड़ दे हर बंद, वह तूफान बनेगा

इंसान की औलाद है, इन्सान बनेगा। (फिल्म-धूल का फूल, साल 1959)

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महिला समानता के हामी

साहिर लुधियानवी महिला-पुरुष समानता के बड़े हामी थे। औरतों के खिलाफ होने वाले किसी भी तरह के अत्याचार और शोषण का उन्होंने अपने फिल्मी गीतों में जमकर प्रतिरोध किया। भारतीय समाज में स्त्रियों की क्या स्थिति हैं, जहां इसका उनके गीतों में बेबाक चित्रण मिलता है, तो वहीं इन हालात के खिलाफ एक गुस्सा भी है।

साल 1958 में प्रदर्शित फिल्म साधनामें साहिर द्वारा रचे गए गीत को स्त्री की व्यथा-कथा का जीवंत दस्तावेज कहा जाए, तो अतिश्योक्ति न होगा,

औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया

जब भी चाहा मसला, कुचला जब जी चाहा दुत्कार दिया

मर्दों के लिए हर जुल्म रवां, औरत के लिए रोना भी खता

मर्दां के लिए लाखों सेजें,औरत के लिए बस एक चिता

मर्दों के लिए हर ऐश का हक, औरत के लिए जीना भी सजा

जिन सीनों ने इनको दूध दिया, उन सीनों का व्यापार किया

जिस कोख में इनका जिस्म ढला, उस कोख का कारोबार किया

जिस तन में उगे कोंपल बनकर, उस तन को जलीलो-ख्वार किया।

यही नहीं फिल्म दीदीमें वे देश की नई पीढ़ी को समझाइश देते हुए लिखते हैं,

नारी को इस देश ने देवी कहकर दासी जाना है

जिसको कुछ अधिकार न हो, वह घर की रानी माना है

तुम ऐसा आदर मत लेना, आड़ जो हो अपमान की

बच्चों, तुम तकदीर हो कल के हिन्दोस्तान की।

महिलाओं की मर्यादा और गरिमा के खिलाफ जो भी बातें हैं, साहिर ने अपनी गीतों में इसकी पुरजोर मुखालफत की। वे औरतों के दुःख-दर्द को अच्छी तरह से समझते थे। यही वजह है कि उनके गीतों में इसकी संजीदा अक्काशी बार-बार मिलती है।

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मिले कई पुरस्कार और सम्मान

अपने फिल्मी गीतों के लिए साहिर लुधियानवी कई पुरस्कार और सम्मानों से भी नवाजे गए। फिल्मफेयर अवार्ड के लिए वे नौ बार नॉमिनी किए गए और उन्हें दो बार यह अवार्ड मिला। पहली बार, साल 1964 में फिल्म ताज महलके गीत ‘‘जो वादा किया, वो निभाना पड़ेगा....’’ तो दूसरी मर्तबा उन्हें फिल्म कभी-कभीके इस गीत ‘‘कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है...’’ के लिए यह पुरस्कार मिला।

फिल्म फेयर अवार्ड की शुरुआत साल 1959 में हुई। साल 1959 ‘‘औरत ने जन्म दिया....(फिल्म-साधाना) और 1960 ‘‘तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा..’’ (फिल्म-धूल का फूल) इन दोनों साल भी साहिर के गीत फिल्म फेयर अवार्ड के लिए नॉमिनी हुए, लेकिन बाजी उन्हीं के साथी गीतकार शैलेन्द्र ने जीती।

साहिर के फिल्मी गीतों पर नजर डालने से यह मालूम चलता है कि वे सिर्फ पल दो पल के शायर नहीं थे’, बल्कि वे हर इक पल के शायरथे। हर पल को अपने गीतों में ढालने का हुनर उनमें था।  यही वजह है कि वे जब तक जिन्दा रहे, फिल्मी दुनिया में अव्वल नंबर पर रहे और आगे भी अपने गीतों की बदौलत अव्वल नंबर पर ही रहेंगे। उन जैसे नगमा निगार बार-बार नहीं आते।

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ज़ाहिद ख़ान

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और आलोचक हैं। कई अखबार और पत्रिकाओं में स्वतंत्र रूप से लिखते हैं। लैंगिक संवेदनशीलता पर उत्कृष्ठ लेखन के लिए तीन बार ‘लाडली अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है। इन्होंने कई किताबे लिखी हैं।