तवायफ से मलिका बनी ‘बेगम समरू’ कहानी

तवायफ से मलिका बनी ‘बेगम समरू’ कहानी
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भारत, जहां अधिकतर इतिहास लोक में ही ज़िन्दा है, वहाँ अनाम वीरों को खोजना और उनका अधिकृत इतिहास लिखना बहुत मुश्किल काम है। उनके लिए फिर वे लेखक आगे आते हैं, जो इतिहासकार नहीं हैं, लेकिन उनकी अपनी संवेदना उन्हें उनसे जोड़ती है। इसमें दो तरह के खतरे सदैव रहते हैं, एक तो अतिरंजना और दूसरे लेखक की अपनी श्रद्धा अथवा अश्रद्धा। क्योंकि अगर उस पात्र के प्रति लोक की श्रद्धा को निकाल दिया जाए, तो उसे विद्वानों के बीच पहुंचाना कठिन हो जाएगा।

ऐसा ही भूला-बिसरा एक पात्र है, दिल्ली के करीब की बेगम समरू। दिल्ली के अंदर आज भी उनकी हवेलियाँ उनका इतिहास तो बताती हैं, लेकिन उस वीर एवं बहादुर तथा तुरंत निर्णय लेने वाली महिला को हम नाच-गर्लया नर्तकी कह कर खारिज कर देते हैं। उस पर तवज्जो देने की फुर्सत किसी को नहीं मिलती।

दिल्ली में चाँदनी चौक स्थित भगीरथ पैलेस में आज जो स्टेट बैंक की बिल्डिंग है और जिसे पहले इंपीरियल बैंक कहा जाता था, वह बेगम समरू की ही बिल्डिंग है। कौड़िया पल के समीप पुरानी दिल्ली स्टेशन को मुड़ते ही बाईं तरफ कोने पर जो हवेली है, वह बेगम समरू (Begum Samru) की ही मिल्कियत है।

मालूम हो कि दिल्ली के कई रेजीडेंट बहादुर बेगम की मेहमान-नवाज़ी का लुत्फ उठाने इसी कोठी पर आते थे। यह भी कहा जाता है, कि लखनऊ का राज भवन भी बेगम समरू का ही गेस्ट हाउस था। बाकी मेरठ के करीब सरधना में बेगम समरू का महल और उसका बनवाया गिरिजा घर आज भी अपनी शैली में अद्वितीय है।

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समरू साहब की कहानी?

मार्च 1707 में औरंगजेब की मौत के बाद से ही भारत, जिसे तब हिन्दोस्थान कहा जाता था, के दुर्दिन शुरू हो गए थे। उनके बाद जो भी मुगल बादशाह दिल्ली के तख्त पर बैठा, वह या तो नाकारा निकला अथवा हद दर्जे का विलासी।

दूसरी तरफ औरंगजेब की अति केंद्रीकरण की नीतियों से आजिज़ आकर दक्षिण में मराठे और उत्तर में राजपूत, सिख तथा जाट किसान विद्रोही बनते जा रहे थे। इनके अंदर राज करने की लालसा भी बढ़ रही थी। उधर दिल्ली के नाकारा बादशाह, अपनी फौजें तो नियंत्रित कर नहीं पा रहे थे।

यहीं वजह हैं कि वे भाड़े के सैनिकों को भर्ती कर रहे थे और इसको उससे तथा उसको इससे लड़वा कर किसी तरह चीजों को काबू में रखने की असफल कोशिशों में जुटे थे। इन भाड़े के सैनिकों (मर्सीनरीज़) में या तो पश्चिम और मध्य एशिया से आए दुर्दांत लड़ाके थे, अथवा यूरोप के व्यापारी, जो भारत में व्यापार करने एवं अपनी अद्योगिक क्रांति से उत्पन्न उत्पादों को भारत में ठेलने खातिर टहल रहे थे।

जब मुगलों की कमजोरी से सल्तनत छोटी-छोटी रियासतों में सिमटती जा रही थी। उस समय विदेशी सौदागर और सैन्य टुकड़ियों के मालिक यहाँ अपने पैर जमाने में कामयाब होते जा रहे थे। वह ब्रिटिश आविर्भाव का भी समय था।

जर्मनी के एक गुमनाम-से क़स्बे से घुमक्कड सैनिक के रूप में भारत आकर क़िस्मत चमकाने वाला योद्धा वाल्टर रेन्हार्ट सोम्ब्रे (Walter Reinhardt) उर्फ़ समरू साहब अपनी दिलेरी, दुस्साहसी और परिस्थितियों से सरधना का जागीरदार बन बैठा था।

मुग़ल शहंशाह शाह आलम-द्वितीय ने अतिरिक्त रूप से उसे आगरा का सिविल और मिलिट्री गवर्नर भी बना दिया था।

बताते है की, आगरा पर मराठा प्रभुत्व की संभावनाओं को दूर रखने के लिए ऐसा किया गया। वह सरधना की जागीर की देखरेख के साथ ही अपनी बेगम को लेकर तत्कालीन अकबराबाद यानी आज के आगरा में आ बसा था।

समरू की सरधना जागीर, वह जागीर थी जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ़्फ़रनगर जनपद के बुढ़ाना क़स्बे से लेकर वर्तमान अलीगढ़, जो तब कोल कहलाती थी, के टप्पल तक, दोआब के उर्वरा और ख़ुशहाल इलाक़े में फैली थी। कम लोग जानते हैं कि सोम्ब्रे और उसकी पत्नी बेगम समरू का आगरा से कितना नज़दीकी रिश्ता था।

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सरधना की मलिका

जनरल समरू साहब की आगरा की दूसरी पारी थी। पहले समरू को आगरा क़िले का क़िलेदार बनाया गया था। उसी समय समरू साहब ने अपने रहने के लिए आगरा में एक निवास बनवाया था। लाल क़िले से दूर यह महलनुमा आवास शहर के शाहगंज इलाक़े के उस भाग में था, जो रास्ता फ़तेहपुर सीकरी की ओर जाता है। महल की बाहर की दीवार अष्ट भुजाकार आकार की थी, जिसमें आठ फाटक थे।

मुख्य गेट के दरवाज़े के ऊपर संगमरमर में समरू का कुलचिन्ह अंकित किया गया था। उर्दू शिलालेख में साल 1763 भी लिखा दिखाई देता था। समरू के बाग़ के नाम से मशहूर रहे इस आलीशान महल का कुछ सालो पहले केवल दो मंज़िला द्वार ही बचा था, शेष पर अवैध क़ब्ज़े हो चुके हैं। इमारत के चारों ओर जो बुर्जियां थीं, उनमें से सिर्फ़ दो ही बची हैं।

तब उसकी पत्नी फ़रज़ाना ने बेगम समरू बन कर जो राज किया तो वह 58 साल की लंबी अवधि तक अपनी कूटनीति, चातुर्य, साहस और वीरता से इस क्षेत्र को दृढ़ता से संभाले रखने के लिए जानी गई।

जनसत्ताके संपादक रहे, शंभू नाथ शुक्ल लिखते है कि, “बेगम की क्रोनोलोजी बस इतनी सी ही है। वे 1751 में पैदा हुईं, और 1836 में मर गईं। लेकिन इस 85 साल की उम्र में बेगम ने जो इतिहास रचा वह अद्वितीय है। यह बेगम की बुद्धि ही थी, जिसके बूते वह कोठे से निकल कर इतनी बड़ी मलिका बनी।।

कोई उसे नचनिया कहता था, कोई कोठेवाली। कुछ लोगों ने उसे लावारिस भी कहा, जिसके खानदान का सही से कुछ अता-पता नहीं था। ऐसी ही थी वह, पर अपनी अस्मिता का सौदा नहीं किया कभी उसने, न किसी से गद्दारी की। कितने ही यतीमों का सहारा थी वह। इन लोगों के लिए वह अपनी मौत के बाद भी सम्मानजनक जीवन की व्यवस्था कर गई।

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वफादारी और चारित्रिक गुण

मेरी लिखी बेगम समरू का सच272 पृष्ठों में सिमटी किताब उस नर्तकी की कहानी है जिसने अपने रूप, चातुर्य, शौर्य और कूटनीति से अट्ठावन साल तक सरधना पर राज कर दुनिया को विस्मित किया। फ़रजाना से बेगम समरू बनी इस बाला की सच्ची कहानी में सब कुछ है। युद्ध, राजनीति-कूटनीति है, तो प्रेम भी है, षड्यंत्र भी, शालीनता, संशय और निर्ममता भी।

बेगम काफी सख्तमिजाज थी, पर अच्छे लोगों को पलकों पर बिठाना भी जानती थी। युद्ध भूमि में हमेशा आगे रहकर, कभी हाथी पर, कभी घोड़े पर, कभी पालकी में सवार, पगड़ी बांधे, तलवार लहराती वह सुंदरी जब अपनी सेना का नेतृत्व करती तब उसके खौफ, हिम्मत और रणनीतियों का ऐसा मेल सामने होता कि शत्रु सेना की पराजय निश्चित होती थी।

ऐसा नहीं था कि उसे अवसर न मिले हों, या वह महत्त्वाकांक्षी न हो, पर फ़रजाना से बेगम समरू, उर्फ़ जोहाना नोबिलिस, उर्फ जेब-उन्न-निसा बनी इस स्त्री के लिए वफादारी और चारित्रिक गुण प्राथमिकता रखते थे। जब उसे  कमजोर होती दिल्ली सल्तनत पर राज करने की पेशकश तश्तरी में सजा कर दी गई, तो वह तो ठुकराई ही, उल्टे बेगम ने उस आक्रांता के धूर्त इरादों से मुगल सल्तनत की डट कर रक्षा भी की।

शंभू नाथ लिखते है, उस दौर में जब भारत की राजनीति में कुचक्र, साजिशें, षड्यंत्र और लूटपाट आम बात थी। खुद राजा और बादशाह ही नहीं सुरक्षित था। हर कोई किसी न किसी के विरुद्ध साज़िश कर रहा था। कोई सरकार ऐसी न थी, जो स्थिर कही जा सके। यहाँ तक कि ब्रिटिशर्स भी। न उनका कलेक्टर, न कंपनी न उनकी सेना। मगर बाज़ार की चाहत उन्हें यहाँ रोके थी। एक ऐसे काल में किसी रानी का बार-बार अपनी रियासत बचाना और सत्ता संतुलन बनाए रखना आसान नहीं था, खासकर उस रानी का, जिसका कोई इतिहास नहीं, कोई अतीत नहीं और कोई भी स्थिर भविष्य नहीं।

सन 1751 में जन्मी फ़रजाना का यह वैविध्यपूर्ण जीवन काल 1836 तक चला। न जाने कितने धर्मार्थ और सामाजिक कार्य किये उसने। जो एक बार मिला, उसका मुरीद हो गया। भोजन और भेंट के बिना बेगम ने कभी किसी को नहीं लौटाया। वह करीने से रहती थी, पर खुद के लिए सजने का उसे शौक नहीं था।

आगरा में रहते हुए ही, 4 मई ईसवीं 1778 को एक संक्षिप्त बीमारी में वाल्टर रेन्हार्ट सोम्ब्रे की साँसें ठहर गईं। ईसाइयों के रीति-रिवाज से सोम्ब्रे को पहले अकबराबाद में उनके विशाल बंगले के बाग़ में ही दफ़नाया गया था। बाद में आगरा के ही पुराने रोमन मिशनरी क़ब्रिस्तान परिसर में उनको ससम्मान दफ़नाया गया। वहां उनका अष्टकोणीय आकृति का मक़बरा बना। उस पर पोर्चुगी और फ़ारसी में उनके लिए इबारतें लिखी गई हैं, जो आज भी उनकी निशानी के तौर पर मौजूद है।

जनरल समरू की मौत के बाद तक बेगम सालों-साल शिद्दत से आगरा आती-जाती रहती और अपने मरहूम शौहर की क़ब्र पर उनकी रूह की शांति की दुआ करती। उस दिन ग़रीब लोगों में ख़ैरात बांटती और अपनी रियाया की ख़ुशहाली के लिए मन्नतें मांगती।

27 जनवरी सन 1836 में जब बेगम समरू की सरधना में मौत हुई। जब उसे मौत ने अपने आगोश में लिया तो सरधना का सूर्य जैसे हमेशा के लिए अस्त हो गया। इस दिन सरधना ने तिमिर की चादर ओढ़ ली थी। इस नीरवता में घरों में चूल्हे नहीं जले, सिर्फ रुदन के स्वर शांति को भंग करते थे।

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लायक वारिस नहीं मिला

बेगम के मौत के बाद उनकी अथाह परिसंपत्तियों पर बेगम के दत्तक पुत्र डेविड सोम्ब्रे (David Ochterlony) ने दावा किया। मगर उसके दावों को ख़ारिज कर क़ब्ज़ा लेने की कार्यवाही आगरा के लेफ्टिनेंट-गवर्नर सर चार्ल्स मेटकाफ़ ने ही की थी।

बेगम ने अपनी विरासत को लायक वारिस के हाथों सौंपने का पूरा प्रयास किया, पर यह मात्र प्रारब्ध था कि यह  विरासत जल्दी ही छिन्न-भिन्न हो गई। डेविड को जो विरासत चांदी की तश्तरी पर रख कर मिली थी, वह संभवतः उसके योग्य नहीं था। तमाम विरीत परिस्थितियाँ पहले ही बन चुकी थी। सच है, जिसे सहेजने में युगों लगते हैं, नष्ट होने में लम्हे भी नहीं लगते।

शंभू नाथ लिखते है, यकीनन बेगम समरू को इतिहास में याद रखना चाहिए, पर उस दौर के दस्तावेज़ बेगम के बारे में बहुत कुछ नहीं बताते। यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा, कि बेगम समरू का इतिहास लिखने में किसी ने रूचि नहीं दिखाई। मध्यकाल और मुगलों का पतन लिखने वालों ने भी बेगम को विस्मृत कर दिया।

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author

राजगोपाल सिंह वर्मा

लेखक आगरा स्थित साहित्यिक हैं। भारत सरकार और उत्तर प्रदेश में उच्च पदों पर सेवारत। इतिहास लेखन में उन्हें विशेष रुचि है। कहानियाँ और फिक्शन लेखन तथा फोटोग्राफी में भी दखल।