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‘लव जिहाद’ किसके दिगाम कि उपज हैं?

‘लव जिहाद’ किसके दिगाम कि उपज हैं?
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जकिया सोमन का नजरिया :

डिस्क्लेमर : भारत के केंद्रीय सरकार ने लव जिहाद जैसे किसी शब्द को परिभाषित नही किया हैं 5 फरवरी 2020 को लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने इसपर खुलासा कर बlताया था, ऐसा कोई शब्द हमारे संज्ञान में नही आया हैउन्होंने कहा, केरल हाई कोर्ट समेत कई अदालतें ये विचार रख चुकी हैं कि लव जिहाद की कोई क़ानूनी परिभाषा नहीं है किसी केंद्रीय एजेंसी ने लव जिहाद का कोई मामला दर्ज नहीं किया है” – संपादक

भाजपा के मुख्यमंत्री आजकल कथित लव जिहाद के खिलाफ कानून की बात कह रहे हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार ने तो कानून बना भी दिया है। साथ ही, मध्य प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक जैसे राज्यों में भी ऐसे कानून की बात जोरों से हो रही हैं।

आखिर, तथाकथित लव जिहाद है क्या? आज देश में आर्थिक संकट मंडरा रहा है। लोगों के पास रोजगार नहीं है, और उद्योग-कारोबार ठप पड़े हैं। दूसरी ओर, कोविड महामारी के चलते स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा रही हैं, और चारों ओर हजारों जाने जा रही हैं।

सरहद पर चीन की हरकतें लगातार जारी हैं। महिला के लैंगिक उत्पीड़न और महिला पर बलात्कार की खबरें आम हो चली हैं। स्पष्ट है कि कुछ राज्य सरकारों की प्राथमिकता इनमें से एक भी नहीं है। प्रतीत होता है कि वे सिर्फ धर्म की राजनीति करने मे व्यस्त हैं।

तथाकथित लव जिहाद पितृसत्तात्मक मानसिकता एवं धर्म की राजनीति की पैदावार है। संविधान सभी नागरिकों को निजी निर्णय, निजी चयन एवं निजी स्वतंत्र्य का अधिकार देता है।

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साजिश का सबूत नहीं

संविधान की धारा 13 और 14 के मुताबिक आपकी जीवन शैली जैसे कि आप क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं आपका निजी निर्णय है। धारा 21 के तहत आप अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी कर सकते हैं। देश का कानून हर नागरिक को पर्सनल लिबर्टी या निजी आज़ादी देता है।

नागरिक के निजी जीवन में सरकार की कोई भूमिका नहीं है। दो नागरिक आपस में खुल के प्यार कर सकते हैं। अपनी पसंद से शादी कर सकते हैं। आज तो समलैंगिक शादी को कानूनन वैध बनाने की प्रक्रिया चल रही है। किसी भी महिला और पुरुष की शादी दोनों की मर्जी से हो सकती है। उनके निजी मामले में सरकार को किसी भी किस्म दखल का अधिकार नहीं है।

वैसे जिहाद का मतलब संघर्ष होता है, जिन्होंने जिन्दगी में कभी भी प्यार किया होगा वे जानते हैं कि कभी कभी प्यार पाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है। लेकिन राजनीति से प्रेरित होकर कुछ राजनेता दो नागरिकों के बीच प्यार को अवैध करार देने में लगे हुए हैं।

वैसे फरवरी, 2020 में संसद के सत्र में गृह राज्यमंत्री ने सबूतों के हवाले से कहा था कि देश में लव जिहाद का एक भी केस दर्ज नहीं है। केरल और कर्नाटक राज्यों में तथाकथित लव जिहाद केस में तहकीकात में मिला इनमें किसी भी रूप से कोई भी साजिश का सबूत नहीं है।

मिहिर श्रीवास्तव और राउल ईरानी ने करीब दो साल तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, आगरा, अलीगढ़ जैसे जिलों में सर्वेक्षण करने पर पाया कि आंतरधार्मिक शादी (तथाकथित लव जिहाद) वाले सभी दंपति हंसीखुशी से जीवन व्यापन कर रहे थे। उन्होंने कुछ स्थानीय राजनेता, राजनीति से जुड़े धार्मिक नेता और लोकल मीडिया को झूठ फैलाने और दंपतियों को अवैध रूप से परेशान करने के सबूत इकट्ठा करके किताब लिखी है।

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नारी को अबला समझने वाले

लव जिहाद के नाम पर धर्म की राजनीति करने वाले नेता स्त्री को अबला और गौण समझते हैं। उनके मुताबिक 21 वीं सदी की भारतीय नारी अपनी जिन्दगी के महत्त्वपूर्ण निर्णय करने के लिए सक्षम नहीं है। उनके मुताबिक आम भारतीय लड़की या महिला को बहला-फुसला कर फंसा लेना आसान है, जबकि सचाई कुछ और ही है।

आज देश की लड़कियां अपने अधिकार और अपने हितों के में जानकार हैं। खुद अपने निर्णय ले सकती हैं और उन्हें बखूबी निभा भी सकती हैं। जानती हैं कि लोकतंत्र उन्हें निजी स्वातंत्र्य एवं निजी चयन का देता है। वह समान मानवीय अधिकार एवं समान नागरिक अधिकार चाहती हैं।

वह जानती हैं कि महिला होने के नाते वे किसी की संपत्ति नहीं हैं, और ना ही वे अपने जीवन में किसी का दखल बर्दाश्त करेंगी। अगर खुद चुना हुआ पति सही नहीं हुआ तो वे उसे कोर्ट जरूर ले जाएंगी हिन्दू हो या मुस्लिम; इस बात कोई फरक नहीं पड़ता।

आज की भारतीय महिला के पास कई उपाय मौजूद हैं। शादी धोखाधड़ी से की गई हो या घर में हिंसा हो रही हो तो उसके लिए दफा 494 हिंसा विरोधी कानून, दहेज विरोधी कानून और अन्य उपाय उपलब्ध हैं। संविधान के अनुसार निजी आज़ादी सर्वोपरि हैं; इस हकीकत के बारे में महिला जागृत है।

संविधान की धारा 25 हर भारतीय को धर्म स्वातंत्र्य का अधिकार देती है। जबरन या फरेबी धर्म परिवर्तन को धर्म स्वातंत्र्य नहीं कह सकते। दोनों में स्पष्ट अंतर है। हाल में इलाहाबाद हाई कोर्ट एक हिन्दू धर्म में परिवर्तन के बाद मुस्लिम महिला हिंदू पुरुष से शादी के सुनवाई कर मामले की रहा था। अपने फैसले में हाई कोर्ट ने कहा कि केवल शादी करने की मंशा से किया गया धर्म परिवर्तन वैध नहीं है।

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किसी भी धर्म में शादी की आज़ादी

अन्य पाच मामलों की सुनवाई में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि धर्म एवं शादी हर नागरिक का निजी मामला है, जिसमें कोर्ट की भूमिका नहीं होनी चाहिए।

(26 नवम्बर को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपना ही पुराना फैसला पलटते हुए कहा की, हम आंतरधार्मिक शादी को हिंन्दू या मुस्लिम के नजरिये से नही देखते

कोर्ट ने कहा, हम प्रियंका खरवार और सलामत को हिन्दू और मुस्लिम के तौर पर नहीं देखते हैं इसके बजाय हम इन्हें दो वयस्क लोगों के रूप में देखते हैं जो अपनी इच्छा और चुनाव से शांतिपूर्वक और ख़ुशी से एक साथ रह रहे हैं

अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, जीवन और निजी आज़ादी के अधिकार में निहित है निजी संबंधों में दख़ल दो लोगों के चुनाव करने की आज़ादी में गंभीर अतिक्रमण होगा

कोर्ट ने कहा है, “वयस्क हो चुके शख़्स का अपनी पसंद के शख़्स के साथ रहने का फ़ैसला किसी व्यक्ति के अधिकार से जुड़ा है और जब इस अधिकार का उल्लंघन होता है तो यह उस शख़्स के जीवन जीने और निजी आज़ादी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है क्योंकि इसमें चुनाव की आज़ादी, साथी चुनने और सम्मान के साथ जीने के संविधान के आर्टिकल-21 के सिद्धांत शामिल हैं- संपादक)

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धर्म की राजनीति

देश में स्पेशल मेरिज कानून, 1954 से लागू है। इसके तहत कोई भी दो स्त्रीपुरुष अपनी मर्जी से शादी कर सकते हैं। इस कानून में और संशोधन करके इसे मजबूत बनाने की जरूरत है। इसे व्यापक रूप से प्रचलित करने की भी जरूरत है।

देश में धर्म की राजनीति चल रही है। इस राजनीति के सूरमा और लाभार्थी नहीं चाहते कि देश में आपसी मेलमिलाप हो। वे चाहते हैं कि देश धर्म और जाति नाम पर हमेशा विभाजित रहे और उनकी राजनीति चलती रहे। तथाकथित लव जिहाद उनके दिमाग और मानसिकता की उपज है।

सवाल है कि देश किन मूल्यों एवं सिद्धांतों पर चलेगा? क्या राजनीति से प्रेरित कानून बनाए जाएगे या संविधानिक मूल्यों का सम्मान होगा? प्रधानमंत्री एवं संसद का तुरत तौर पर अत्यावश्यक कदम उठाने की जरूरत है। जुबानी तीन तलाक के खिलाफ सरकार ने सही नीति अपनाई हैं।

प्रधानमंत्री ने बेटो बचाओ, बेटी पढ़ाओ पर जोर दिया है। उन्हें चाहिए कि उत्तर प्रदेश के प्रस्तावित कानून को रोकें। संविधान की धाराओं मों से सीधे रूप से टकराने वाले एवं विपरीत कानूनों पर रोक लगनी चाहिए। पुरुष प्रधान विचारधारा एवं धार्मिक विभाजन की राजनीति के लिए लोकतंत्र में कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

(लेखिका नारीवादी आंदोलन के संस्थापक हैं। उनका ये आलेख राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित हुआ हैं)

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टीम डेक्कन

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