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बाबरी के बाद ‘राम के नाम’ इस रेकॉर्ड का क्या होंगा?

बाबरी के बाद ‘राम के नाम’ इस रेकॉर्ड का क्या होंगा?
Reuters

आनंद पटवर्धन का नज़रिया :

लालकृष्ण आडवाणी ने जो पहली रथयात्रा निकाली उसके मार्ग की शुटिंग करना हमारी लघु फिल्म ‘राम के नाम’ का एक कार्य था। यात्रा के लिए वातानुकूलित टोयोटा ट्रक को बॉलीवुड सेट-डिज़ाइनर द्वारा श्रीराम-रथ में परिवर्तित किया गया था।

पूरे भारत का दौरा करने वाली इस यात्रा ने हिन्दुओं के मन में बाबरी मस्जिद स्थल पर एक मंदिर बनाने का बीजारोपण किया।

यात्रा का नारा था ‘मंदिर वही बनाएंगे’, लेकिन कुछ स्थानों पर अनुयायियों ने और भी कई उन्मादी घोषणाएं दी, जिसके परिणामस्वरूप कुछ स्थानों पर दंगे भड़क उठे और कई लोगों की जान चली गई।

आखिरकार, बिहार में आडवाणी की गिरफ्तारी ने जुलूस को रोक दिया; लेकिन कारसेवकों ने अपनी यात्रा जारी रखी और 30 अक्टूबर, 1990 को पहली रथ यात्रा के कारसेवक अयोध्या पहुंचे।

तब वहां मस्जिद थी। इस मस्जिद के प्रवेश द्वार पर स्थित एक शिला थी, जो दर्शा रही थी की संबंधित मस्जिद का निर्माण 1528 में बाबर के सेनापति मीर बाकी द्वारा किया गया था।

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रामचरितमानस का जिक्र

तुलसीदास का जन्म साल 1511 में हुआ था। उन्होंने अवधी बोली में ‘रामचरितमानस’ की रचना की। तब तक संस्कृत भाषा में मौजूद ‘वाल्मिकीनारायण’ को पढ़ने की अनुमती संस्कृत जानने वालें जाति समुदाय को ही थी।

तुलसीदास, जो एक ब्राह्मण थे, लेकिन एक अनाथ थे, उन्होंने संस्कृत के राम को अवधी में ले आया था। तत्कालीन सनातनवादियों के विरोध के बावजूद वे इसे लोगों तक ले गए। सम्राट अकबर (1556-1605) के शासनकाल के दौरान, ‘रामचरितमानस’ पर आधारित ‘रामलीला’ शुरू हुई थी। रामकथा लोगों तक पहुंचने के बाद जगह जगह राम मंदिरों का निर्माण होने लगा।

तुलसीदास ने अपना अधिकांश समय अयोध्या में बिताया था। उसी आयोध्या में हम दोनों (हम दोनों ही फिल्म बना रहे थे) अक्टूबर 1990 को कारसेवकों के पहले पहुंच चुके थे। हमें यह कहते हुए 20 से अधिक मंदिर दिखाए गए थे कि ‘प्रभुराम का जन्म यहीं हुआ था।’

तुलसीरामायण में कहीं भी जिक्र नही है की, राम का जन्म जहां हुआ वहां मंदिर था और बाबर ने (तब हाल ही में) उसे ढहाया। ऐसे कोई भी संदर्भ का पता लगाना मुश्किल है। 

लेकिन यह बताना मुमकीन है कि तुलसीदास के 300 साल बाद भी इस जगह पर जन्मभूमि-मस्जिद विवाद कैसे उत्पन्न हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दिए गए के रिकॉर्ड के अनुसार, अंग्रेजों ने 1856-57 में (ईस्ट इंडिया कंपनी की अवधि के दौरान) साइट को विभाजित करने वाली एक दीवार बनाई और पहला हिन्दू-मुस्लिम झगड़ा हुआ।

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अंग्रेजों का जहर

दीवार के बीच मस्जिद और बाहर का हिस्सा हिन्दुओं का, इस तरह विभाजन हुआ। जिसकी वजह से मुसलमानों को हिन्दुओ के नियंत्रण वाले क्षेत्र से गुजरना पड़ता था। याद रहे.. 1857 का साल! यह आजादी की पहली जंग थी (जिसे अंग्रेजों ने ‘सिपाहियों का विद्रोह’ कहा था)।

इसी साल हिन्दू और मुसलमान एक साथ आकर बहादुरी से अंग्रेजों के खिलाफ लड़े और उनके नाक में दम कर के रख दिया। अंग्रेजों की पहली ‘तोड़ो और राज करो’ नीति उसी साल दिखाई दी और उसी साल अयोध्या में दीवार खड़ी कर दी गई।

हालाँकि, लगता नही की, 1857 साल की ये संगती सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान में ली होंगी। या फिर इस जगह पर पहले कभी इस जगह को लेकर दंगा हुआ है या नहीं, इस ब्यौरा में अदालत नहीं गयी। 

उपलब्ध अभिलेखों में कहा गया है कि 1856-57 में, बाबा रामचरण दास के नेतृत्व में हिन्दुओं और तत्कालीन जमींदार अच्छन खान के नेतृत्व में मुसलमानों ने इस भूमि का समझौता किया।

यह तय किया गया था कि हिन्दुओं को दीवार के बाहर और मुसलमानों ने अंदरुनी हिस्से (मस्जिद) में अपनी धार्मिक गतिविधियां करनी चाहिए। एक ही जगह को मंदिर और मस्जिद में विभाजित करनेवाला ये फैसला 23 दिसम्बर 1949 तक रहा।

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अदालत की रोक

स्वतंत्रता के बाद, लेकिन गणतंत्रपूर्व के दिनों में, कुछ हिन्दुओं ने मस्जिद क्षेत्र में राम की मूर्तियां स्थापित कीं। उस समय जिन्होंने मूर्तीयां रखी थी, ऐसे कोई लोग मिलेंगे क्या इसकी खोज हमने की। यह तलाश अक्टूबर 1990 तक जारी रही।

आखिरकार मैं ऐसे व्यक्ति से मिला, जिसने कहा कि वह खुद मूर्ति ले गया था। उसने जो कहां, उसका हमने फिल्म में डॉक्यूमेंट किया। 

साल 1949 में, के.  के. नायर नाम के एक जिला कलेक्टर थे, उन्होंने इस आधार पर मूर्ति हटाने से इनकार कर दिया कि इससे कानून-व्यवस्था बाधित होगी। बाद में वह जनसंघ (पूर्व में भाजपा) में शामिल हो गए और सांसद बन गए। 

सन 1949 से ही अदालत ने मुसलमानों को इस जगह प्रवेश देने से इनकार कर दिया। लेकिन उन्होंने मूर्ति के लिए पुजारी नियुक्त करने के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। हमने इन पुजारियों में से एक, महंत लालदास, जो काफी ज्यादा चर्चित हो गए थे, उनकी कहीं हुई बातों का फिल्म में दस्तावेजीकरण किया।

30 अक्टूबर, 1990 को हुई घटना के बाद उन्होंने कहा था कि “मस्जिद पर हमला गलत था।” 

उन्होंने यह भी कहा था कि “विश्व हिंदू परिषद या भाजपा के लोग भक्तिभाव से नहीं के लिए आ रहे हैं, बल्कि राजनीति और पैसों के बलबुते उनका आंदोलन जारी है।” लालदास ने उस समय के कुछ उदाहरण भी दिए थे और बताया था की धर्म के नाम पर भ्रष्टाचार कैसे फल-फुल रहा है।

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धर्मनिरपेक्षता हुई ध्वस्त

न घटनाओं के बाद, 6 दिसंबर, 1992 का वह दिन निकला। उस समय उत्तर प्रदेश में भाजपा सत्ता में थी। उस दिन बाबरी मस्जिद को हिन्दुओं ने ध्वस्त कर दिया था। उस मस्जिद में, 1949 तक नमाज अदा कर रहे इमाम के साथ इलाके के कई लोगों ने बाद के हिंसा में अपनी जान गंवा दी। एक साल बाद पुरोहित लालदास की भी  हत्या कर दी गई।

कोई कहेगा कि इस तरह इतिहास को कुरेदने से अब क्या होगा? लेकिन इतिहास के कई रिकॉर्ड सोचने पर मजबूर करते हैं। उदाहरण के लिए, अच्छन खान और बाबा रामचरण दास, जिन्होंने दीवार के विवाद को सुलझा लिया था, उन दोनों पर 1857 में अंग्रेजों द्वारा राजद्रोह का आरोप लगाया गया और दोनों को फांसी दे दी गई।

जिन लोगों ने इमारत को ध्वस्त कर दिया और इस कृती के परिणामस्वरूप उपमहाद्वीप में कई लोगों की जान चली गई। इस अपराध के पीछे का मकसद कानूनी रूप से 9 नवंबर, 2019 को हासिल किया गया।  5 अगस्त 2020 को आयोध्या में राम मंदिर की आधारशिला रखी गई। इस के साथ ही देश का धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र ढेर के नीचे दफन हो कर रह गया।

*ये आलेख 9 अगस्त 2020 को मराठी अखबार लोकसत्ता में प्रकाशित हुआ था।

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टीम डेक्कन

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