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आज भी ‘हर जोर-जुल्म की टक्कर में’ गूंजता हैं शैलेंद्र का नारा

आज भी ‘हर जोर-जुल्म की टक्कर में’ गूंजता हैं शैलेंद्र का नारा

हिन्दी साहित्य में शैलेंद्र की पहचान क्रांतिकारी और संवेदनशील गीतकार के तौर पर है। वे सही मायने में जन कवि थे। उनकी कोई भी कविता और गीत उठाकर देख लीजिए, उसमें सामाजिक चेतना और राजनीतिक जागरूकता स्पष्ट दिखलाई देती है।

बाबा नागार्जुन, शैलेंद्र को युग की व्यथा-कथा और जन-मन के उल्लास का कवि मानते थे। उनके ज्यादातर गीत जिन्दगी और जन आंदोलन से निकले हैं। भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा से उनका जुड़ाव रहा। इप्टा का थीम गीत तू जिन्दा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर...शैलेंद्र का ही लिखा हुआ है।

ये ऐसा जोशीला गीत है जो आज भी जन आंदोलनों, नुक्कड़ नाटकों में कामगारों और कलाकारों द्वारा गाया जाता है। गीत का एक-एक अंतरा लोगों के दिल में कुछ करने का जज्बा पैदा करता है। जन गीतों में शैलेंद्र का कोई सानी नहीं था।

गीतों में उनकी पक्षधरता स्पष्ट दिखलाई देती है और यह पक्षधरता है दलित, शोषित, पीड़ित, वंचितों के प्रति। एक वक्त जीवनयापन के लिए उन्होंने खुद रेलवे में एक छोटी-मोटी नौकरी की थी। लिहाजा वे मजदूरों-कामगारों के दुःख-दर्द को करीब से जानते थे। इन सब बातों का शैलेंद्र के कवि मन पर बड़ा असर हुआ।

यह कहानी खुद उनकी जबानी, “मशीनों के तानपूरे पर गीत गाते हुए भी सामाजिक विषमता पर नजर जाए बिना न रह सकी। तनख्वाह के दिन (नौ या दस तारीख को) कारखाने के दरवाजे पर जहां मिठाई और कपड़े की दुकानों का मेला लगता था, वहां पठान और महाजन अपना सूद ऐंठ लेने के लिए खड़े रहते थे। देश के बहुत से लोग उधार और मदद पर ही जिन्दगी गुजार रहे हैं। गरीबी मेरे देश के नाम के साथ जोंक की तरह चिपटी है। नतीजा, हम सब एक हो गए-कवि, मैं और मेरे गीत और विद्रोह के स्वर गूंजने लगे।” (मैं, मेरा कवि और मेरे गीतधर्मयुग में प्रकाशित शंकर शैलेंद्र का आत्म परिचय)

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स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा

शैलेंद्र की नौजवानी का दौर, वह दौर था जब देश में आज़ादी की लड़ाई अपने चरम पर थी। उन्होंने भी स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया। इसके लिए वे जेल भी गए। एक तरफ शैलेंद्र के दिल में अपने देश और देशवासियों के लिए कुछ करने का जज्बा था, तो दूसरी ओर थी पारिवारिक जिम्मेदारियां।

पारिवारिक दवाब में उन्होंने मथुरा के रेलवे वर्कशॉप में वेल्डर की छोटी सी नौकरी की। नौकरी के साथ-साथ उनकी पढ़ाई जारी रही। झांसी से उन्होंने रेलवे अप्रेन्टिस का पांच साल का इंजीनियरिंग कोर्स किया। इस दौरान उनका तबादला माटुंगा रेलवे वर्कशॉप मुंबई में हो गया।

रेलवे में नौकरी के दौरान ही शैलेंद्र मजदूरों के सीधे संपर्क में आए। उनके दुःख, परेशानियों से साझेदार हुए। मजदूरों की समस्याओं और उनके शोषण को उन्होंने नजदीकी से देखा। शैलेंद्र का संजीदा मन कामगारों की समस्याओं से आंदोलित हो उठा। वे मजदूरों के अधिकारों और उनको इंसाफ दिलाने के लिए उनके हक में खड़े हो गए।

कामगार यूनियनऔर इप्टाके सरगर्म मेम्बर के तौर पर उन्होंने मजदूरों की आवाज बुलंद की। उनके अधिकारों के लिए संघर्ष किया। शैलेंद्र की जिंदगी के लिए जैसे एक मकसद मिल गया। प्रगतिशील लेखक संघऔर भारतीय जन नाट्य संघ’ (इप्टा) के मंचों से गाये, उनके गीतों ने तो उन्हें मजदूरों का लाड़ला गीतकार बना दिया।

बंगाल के अकाल, तेलंगाना आंदोलन और भारत-पाक बंटवारे जैसे तमाम महत्वपूर्ण घटनाक्रमों पर उन्होंने कई मानीखेज गीत लिखे। जलता है पंजाब साथियो....अपने इस गीत भावपूर्ण गीत के जरिए उन्होंने मुंबई की गलियों-गलियों से दंगा पीड़ितों के लिए चंदा इकट्ठा किया।

नौकरी और मजदूर आंदोलन के बीच शैलेंद्र ने अध्ययन से कभी नाता नहीं तोड़ा। उन्होंने देशी और विदेशी भाषाओं के उत्कृष्ट साहित्य का लगातार अध्ययन किया। संस्कृत, अंग्रेजी, गुजराती, मराठी, बांग्ला, पंजाबी, रूसी आदि चौदह भाषाएं सीखीं और उनके साहित्य का गहराई से अध्ययन किया।

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वामपंथी विचारों से प्रभावित

खास तौर से वे मार्क्सवादी विचारकों और रूसी साहित्य से बेहद प्रभावित थे। इस साहित्य के अध्ययन से उनमें एक दृष्टि पैदा हुई, जो उनके गीतों में साफ नजर आती है। सर्वहारा वर्ग का दुःख, उनका अपना दुःख हो गया। इस दरमियान उन्होंने जो भी गीत लिखे, वे नारे बन गए। शैलेंद्र का एक नहीं, कई ऐसे गीत हैं जो जन आंदोलनों में नारे की तरह इस्तेमाल होते हैं।

वामपंथी विचारधारा में डूबे उनके परिवर्तनकामी, क्रांतिकारी गीतों को सुनकर लोग आंदोलित हो उठते थे। उनके अंदर कुछ करने का जज्बा पैदा हो जाता था। मसलन हर जोर-जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है..”, “क्रांति के लिए उठे कदम, क्रांति के लिए जली मशाल!”, “झूठे सपनों के छल से निकल, चलती सड़कों पर आ!इसमें भी हर जोर-जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है..मजदूर आंदोलनों का लोकप्रिय गीत है।

मजदूर, कामगार इसे नारे की तरह इस्तेमाल करते हैं। यह गीत जैसे उनमें एक नया जोश फूंक देता है। गीत की घन-गरज ही, कुछ ऐसी है। यदि यकीन न हो, तो इस गीत के बोल पर नजर डालिये,”

हर जोर-जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है

तुमने मांगें ठुकराई हैं, तुमने तोड़ा है हर वादा

छीना हमसे अनाज सस्ता, तुम छंटनी पर हो आमादा

तो अपनी भी तैयारी है, तो हमने भी ललकारा है।

मत करो बहाने संकट है, मुद्राप्रसार इन्फ्लेशन है

यह बनियों चोर लुटेरों को क्या सरकारी कंसेशन है?

बगलें मत झांको, दो जवाब, क्या यही स्वराज्य तुम्हारा है

हर जोर-जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है।

न्यौता और चुनौतीशैलेंद्र का एक अकेला कविता संग्रह है। जिसमें उनकी 32 कविताएं और जनगीत संकलित हैं। यह संकलन मराठी के प्रसिद्ध लोक गायक, जनकवि अन्नाभाऊ साठे को समर्पित है। संग्रह की ज्यादातर कविताएं और गीत जन आंदोलनों के प्रभाव में लिखी गई हैं। इन गीतों में कोई बड़ा विषय और मुद्दा जरूर मिलेगा।

शैलेंद्र की कविता और गीतों की यदि हम सम्यक विवेचना करें, तो उन्हें दो हिस्सों में बांटना होगा। पहला हिस्सा, परतंत्र भारत का है। जहां वे अपने गीतों से देशवासियों में क्रांति की अलख जगा रहे हैं। उन्हें अहसास दिला रहे हैं कि उनकी दुर्दशा के पीछे कौन जिम्मेदार है?

अपने ऐसे ही एक गीत इतिहासमें वे पहले तो साम्राज्यवादी अंग्रेजी हुकूमत में मजदूरों और किसानों की दुर्दशा के बारे में लिखते हैं,

खेतों में खलिहानों में

मिल और कारखानों में

चल-सागर की लहरों में

इस उपजाऊ धरती के

उत्तप्त गर्भ के अंदर

कीड़ों से रंगा करते

वे खून पसीना करते!

इस पहले हिस्से में शैलेंद्र की कुछ भावुक कविताएं जिस ओर करो संकेत मात्र’, ‘उस दिन’, ‘निंदिया’, ‘यदि मैं कहूं’, ‘क्यों प्यार किया’, ‘नादान प्रेमिका’, ‘आज’, ‘भूतआदि भी शामिल हैं। यह साधारण प्रेम कविताएं हैं, जो इस उम्र में हर एक लिखता है।

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चलती रही जद्दोजहद

आजादी के बाद, देश की नई सरकार से कई उम्मीदें थीं। देशवासियों को लगता था कि अपनी सरकार आने के बाद उनके दुःख-दर्द दूर हो जाएंगे। समाज में जो ऊंच-नीच और भेदभाव है, वह खत्म हो जाएगा। अब कोई भूखा, बेरोजगार नहीं रहेगा। सभी के हाथों को काम मिलेगा। लेकिन ये उम्मीदें, सपने जल्दी ही चकनाचूर हो गए।

शैलेंद्र जो खुद कामगार और सामाजिक विषमता के भुक्तभोगी थे, उनका दिल यह देखकर तड़प उठा। उनके गीत जो कल तक अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ आग उगलते थे, अब उनके निशाने पर देशी हुक्मरान आ गए। शैलेंद्र जब अपने गीतों से लोगों को संबोधित करते हैं, तो उनकी नजर में हुक्मरान, हुक्मरान है।

फिर वह विदेशी हो या देशी। अपने गीतों में इन हुक्मरानों को वे जरा सा भी नहीं बख्शते हैं।

आजादी की चाल दुरंगी

घर-घर अन्न-वस्त्र की तंगी

तरस दूध को बच्चे सोये

निर्धन की औरत अधनंगी

बढ़ती गई गरीबी दिन दिन

बेकारी ने मुंह फैलाया!

शैलेंद्र अपने इन गीतों में वे देशी सरकार की पूंजीवादी नीतियों का ही विरोध नहीं करते, बल्कि अंत में वे जनता को एक विकल्प भी सुझाते हैं। उन्हें यकीन है कि मजदूर और किसान यदि एक हो जाए, तो देश में पूंजीवादी निजाम बदलते देर नहीं लगेगी। देश में समाजवाद आ जाएगा।

लिहाजा वे उन्हीं का आहृन करते हुए लिखते हैं,

यह कैसे आजादी है

वही ढाक के तीन पात हैं, बरबादी है

तुम किसान-मजदूरों पर गोली चलवाओ

और पहन लो खद्दर, देशभक्त कहलाओ!

तुम सेठों के संग पेट जनता का काटो

तिस पर आजादी की सौ-सौ बातें छांटो!

हमें न छल पायेगी यह कोरी आजादी

उठ री, उठ, मजदूर किसानों की आबादी!

आज़ादी को 75 साल हो गए, लेकिन सत्ता का चरित्र नहीं बदला। सरकारें बदल गईं, चरित्र वही है। अंग्रेजों का बनाया देशद्रोह कानून आज भी सत्ताधारियों का प्रमुख हथियार बना हुआ है। जो कोई भी सरकारी नीतियों का विरोध करता है, उसे देशद्रोह कानून के अंतर्गत जेल में डाल दिया जाता है।

शैलेंद्र अपने गीतों में सिर्फ सरमायेदारी और साम्राज्यवाद का विरोध ही नहीं करते, बल्कि अपने गीतों में इसका एक विकल्प भी देते हैं। उनका मानना है कि समाजवाद में ही किसानों, मजदूरों और आम आदमियों के अधिकार सुरक्षित होंगे। उन्हें वास्तविक इंसाफ मिलेगा। लिहाजा वे इकट्ठा होकर सरमायेदारी के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ें।

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लाजवाब गीत लिखे

फिल्मों में मसरुफियतों के चलते शैलेंद्र अदबी काम ज्यादा नहीं कर पाए, लेकिन उनके जो फिल्मी गीत हैं, उन्हें भी कमतर नहीं माना जा सकता। शैलेंद्र के इन गीतों में भी काव्यात्मक भाषा और आम आदमी से जुड़े उनके सरोकार साफ दिखलाई देते हैं। अपने इन फिल्मी गीतों में उन्होंने किसी भी स्तर का समझौता नहीं किया।

सहज, सरल भाषा में अनोखी बात कह देने की शैलेंद्र में एक कला थी। यही वजह है कि उनके फिल्मी गीत खूब लोकप्रिय हुए। कलाकार, निर्देशक राज कपूर और शैलेंद्र की जोड़ी ने एक साथ कई सुपर हिट फिल्में आवारा’, ‘अनाड़ी’, ‘आह’, ‘बूट पॉलिश’, ‘श्री 420’, ‘जागते रहो’, ‘अब दिल्ली दूर नहीं’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘संगमऔर मेरा नाम जोकरदीं। फिल्मी दुनिया के अपने छोटे से करियर यानी सिर्फ सतरह साल में शैलेंद्र ने 800 से ज्यादा गीत लिखे।

अपने मधुर गीतों के लिए शैलेंद्र को अनेक अवार्डों से नवाजा गया। ये मेरा दीवानापन है’ (यहूदी, 1958), ‘सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी’ (अनाढ़ी, 1959), ‘मैं गाऊं तुम सो जाओ’ (ब्रह्मचारी, 1968) गीतों के लिए उन्हें तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर अवार्ड मिला। शैलेंद्र, फिल्मों में देश की गरीब अवाम के जज्बात को अल्फाजों में पिरोते थे। यही वजह है कि उनके गाने आम आदमियों में काफी लोकप्रिय हुए। आम आदमी को लगता था कि कोई तो है, जो उनके दुःख-दर्द को अपनी आवाज देता है।

14 दिसम्बर, 1966 को महज 43 साल की उम्र में शैलेंद्र ने यह दुनिया छोड़ दी। कवि नागार्जुन ने अपने एक गीत से शैलेंद्र को श्रद्धांजलि देते हुए उस वक्त लिखा था,

गीतों के जादूगर का मैं छन्दों से तर्पण करता हूं

जन मन जब हुलसित होता था, वह थिरकन भी पढ़ते थे तुम

साथी थे, मजदूर-पुत्र थे, झंडा लेकर बढ़ते थे तुम

युग की अनुगुंजित पीड़ा ही घोर घन-घटा सी गहराई

प्रिय भाई शैलेंद्र, तुम्हारी पंक्ति-पंक्ति नभ में लहराई।

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ज़ाहिद ख़ान

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और आलोचक हैं। कई अखबार और पत्रिकाओं में स्वतंत्र रूप से लिखते हैं। लैंगिक संवेदनशीलता पर उत्कृष्ठ लेखन के लिए तीन बार ‘लाडली अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है। इन्होंने कई किताबे लिखी हैं।