कोरोना संकट या एक-दूसरे को बेहतर समझने का मौका

कोरोना संकट या एक-दूसरे को बेहतर समझने का मौका
Fecebook / Javed Dar

मारा देश ही नहीं बल्कि सारी दुनिया एक अजीब दौर से गुजर रही है। सुना है कि एक-दो सदी पहले भी ऐसी कुछ बीमारियां आई थी, जिसमें प्लेग था, उसने आधे यूरोप को साफ कर दिया था, मौत के घाट उतार दिया था। लेकिन अब तो दवाइयां भी अच्छी आ चुकी है, मेडिकल साइन्स ने भी तरक्की कर ली है। अब हम ऐसी बिमारियों को फैलने से रोक लेते हैं, उसका इलाज कर देते हैं। लेकिन इन दिनों जो वायरस (Covid-19) आया है जिसने हम सबको अपने घरों में बंद कर दिया है और जो बेघर हैं वह उससे भी ज्यादा मुसीबत में है।

मैं ऐसा समझता हूँ कि हर बात का, हर काम का, हर हादसे का एक डार्क (काला) साइड होता है, उसी तरह एक ब्राईट (सफेद) साइड भी होता है। हम अगर गौर से देखें, आज करोड़ों लोग बहुत तकलीफ में, लोग सहमे और डरे हुए हैं। यह पता नही चल पा रहा हैं की, कितने लोगों तक इलाज पहुंच पा रहा है, कितने लोगो को यह बिमारी लग चुकी हैं।

एक तरफ दुनिया सहमी हुई है और घबराई हुई है, तकलीफ में है। दूसरी ओर हमारे वैज्ञानिक कोशिश कर रहे हैं कि इसका इलाज ढूंढें और वह मिल जाएगा। इसलिए के इन्सान ने जब भी ध्यान लगाकर कोई काम किया है, थोड़ा देर सवेर हो गई है लेकिन वह हो गया हैं।

इस बिमारी के आँधी में बहुत सी तबाहीयाँ हुई हैं, जैसे हमारे बिजनेस की, ट्रेड की, कॉमर्स की; आम आदमी जो रोज काम करते थे, जो रोज कुआं खोदते थे और पानी पीते थे, अब उन्हें कुआँ खोदने की इजाजत भी नहीं रही है, अब वह बाहरी नहीं निकल सकते, फिर काम कैसे करेंगे! उनके लिए मुसीबतें है।

इसका एक रोशन पहलू भी है कि जो लोग ज्यादा आराम से है, वह लोग जिनके पास जिन्दगी में कुछ हैं, जिन्हें हालात ने, दुनिया ने कुछ दिया है वह अपनी जिम्मेदारियों को बड़ी हद तक महसूस कर रहे हैं। वह उन लोगों की मदद कर रहे है जो लोग ज्यादा भाग्यशाली नहीं है।

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फिल्मवाले मदद के लिए आगे

मैं देख रहा हूँ कि फिल्म इंडस्ट्री के लोग मदद के लिए आगे आ रहे हैं। फिल्म लाईन में बहुत से दिहाडी मजदूर (डेली वेज वर्कर) हैं। आप तो स्क्रीन पर सिर्फ एक्टर्स को देखते हैं, लेकिन उनके पीछे बहुत लोग होते हैं। जो फिल्म का सेट बनाते हैं, जो सेट पर लकड़ी का काम करते हैं, जो प्लास्टर ऑफ पेरिस का काम करते हैं, जो लोग पेंट करते हैं, जो लोग भारी-भारी कॅमेरा और लाइट उठाकर लाते हैं, वह लोग जो कैमरामैन के कहने पर सही जगह पर लाइट लगाते हैं वह लाइटमैन कहलाते हैं। वह वर्कर जो छोटी सी हर चीज का सब अरेंजमेंट करते हैं, सेट पर ऐसे बहुत से लोग हैं।

एक सीन को जब हम फिल्म में देखते हैं, तो हो सकता है; स्क्रीन के ऊपर सिर्फ 2 या 3 एक्टर काम कर रहे हैं। लेकिन उस स्क्रीन पर पीछे 50, 60, 100 आदमी होते हैं, जो यह सारे काम कर रहे होते हैं। जिसमे लाइट, फर्नीचर, सेट सही हो, कॉस्टयूम सही हो - यह सब काम देखते हैं। कितने सारे काम है जो इनके पीछे-पीछे होते रहते हैं। जो लोग फिल्म इंडस्ट्री के नहीं उन्हें इतना पता नहीं होता है, पर पर इंडस्ट्री वालों को तो पता है।

खुशी की बात है कि हमारे जो पूरे स्टार है, जो प्रोड्यसूर है; जो दूसरे लोग हैं, जिन्हें जिन्दगी ने थोडा नवाजा है, वह अपनी जिम्मेदारी को पूरी तरह महसूस कर रहे हैं। सलमान खान जो बहुत बड़े स्टार हैं, वह 26,000 वर्कर के फैमिली की देखरेख कर रहे हैं। शाहरुख खान हजारों लोगों को राशन और पैसा प्रोवाइड कर रहे हैं। हमारी जो एडिटर्स गिल्ड और दूसरे जितने भी संघठन है; वह सारे मदद के काम में लग चुके हैं।

इंडियन परफोर्मिंग राइट्स सोसाइटी (IPRS) यह म्यूजिक डिरेक्टर, गीतकार और म्यूजिक कंपनी के रॉयल्टीज् (Intellectual Rights) का पैसा जमा करती है। मैं उसका चेयरमैन हूँ, हमारे पास कुछ पैसा है। हम सब ने मिलकर जिसके गाने बजते हैं, उससे उन्हें रॉयल्टी मिलती है, उन्होंने तय किया है कि इस रॉयल्टी से उन लोगों की मदद की जायेंगी, उन म्यूजिशीयन की, उन राईटर्स की - जो ठीक हालत में नहीं है और हम उनकी मदद कर रहे हैं।

यह बहुत अच्छी बात है की, चारों तरफ से भाईचारा, इन्सानियत, इन्सान होने के नाते अपना फर्ज क्या है, यह खयाल लोगों में दिलों मे जाग रहा हैं।

कोरोना वायरस की बीमारी तो चली जाएगी, इसे हम हरा देंगे। इन्सान ऐसी किसी भी मुसीबतों को हराकर ही दम लेता है। लेकिन यह खयाल रहे की हमारा लोगों से कुछ रिश्ता है, हमारा भी कोई फर्ज बनता है, यह हमें भूलना नहीं चाहिए।

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हमारे कर्तव्य

सरकारों से जो हो रहा है वह कर रही है, चाहे वह सेंट्रल की हो या स्टेट की हो। ऐसे समय में सरकार कि जिम्मेदारी ज्यादा होती हैं, वह जितना भी करें लोगों को शिकायतें बाकी रह जाती है। यह क्यों नहीं हुआ? वह क्यों नहीं हुआ? लेकिन शिकायत अपनी जगह है, आप वह भी कीजिए। लेकिन यह भी याद रखीये कि एक नागरिक होने के नाते, एक सिटिजन होने के नाते खुद हमारा भी बहुत बडा फर्ज है और यह कर्तव्य सिर्फ इन बुरे दिनों में नहीं है, यह तो हमेशा के लिए है।

हम कहते हैं कि हमें देश से प्यार हैं और हम यह दावा दिल से करते हैं। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि जिस मोहल्ले में, जिस गली में, जिस मकान में रहते हैं, वह मकान और उसके सामने जो कंपाउंड है, उसके सामने जो नाली है और उसके सामने जो गली है, यह सब तो देश है, देश और थोड़ी कहीं है।

यह बहुत छोटा सा और जरा सा हिस्सा जो आपके हिस्से में आया है, आपका कर्तव्य यह है कि अगर देश से प्रेम है तो यह इस हिस्से पर हमारा प्रेम बताईये, तब पता चलेगा कि आपको इस देश से वाकई में प्यार है। क्यों ऐसा होता है कि हम अपने घर का कूड़ा घर से बाहर फेंक देते हैं। ऐसा क्यों होता है कि हम अपने घर को तो सजाकर रखते हैं, मगर बाहर जो नाली है, वह जो गंदी है, वह हमारे घर की थोड़ी है, फिर वह किसकी है? नाली कहां है, इस देश में हैं ना!

अगर हम सब नागरिक अपने-अपने इलाके का, अपने जरा से हिस्से का, अपनी गली-मोहल्ले का थोड़ा सा ध्यान रखें, एक कमेटी बनाकर हमेशा के लिए सफाई का खयाल रखे तो बडा काम हो सकता हैं। अल्टीमेटली यह बिमारियां तो गन्दगी से पैदा होती है। अगर हम हमारा इलाका - जो हमारा हिस्सा है, देश का एक छोटा सा जर्रा बराबर का हिस्सा - जो हमारे हिस्से में आया है, हम उसको ठीक रखेंगे, तो इस देश को बहुत सी हेल्थ प्रॉब्लम से निजात मिल जायेंगी।

हम लोग हेल्थ पर ज्यादा बात नहीं करते। सरकार को भी स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए। एक सरकार नहीं बल्कि सभी सरकारों से मैं कहूंगा। सब जगह हमारी डिमांड होनी चाहिए कि हमारे हर मोहल्ले में एक क्लीनिक हो, जो बिलकुल मुफ्त में हो। जिसमें गरीब से गरीब जाकर अपना इलाज करा सकता हो। जब भी किसी को कोई प्रॉब्लम होंगी तो वहां पहुंच जाएगा, जिससे उसे सहुलत होगी।

हम अपनी एक ऐसी कमेटी बनाएं जो मोहल्ले को, गली को, अपने एरिया को साफ रखें। म्युनिसिपालिटी तो यह काम करती है, उनसे भी डिमांड कीजिए। मगर आप खुद भी कुछ कीजिए। सिर्फ मांगने से काम नहीं चलेगा, आपको भी करना पड़ेगा।

अब जहां इतनी तकलीफें है, लाखों लोग बेघर है, लोगों का काम बंद हो गया, लोग सड़कों पर पैदल चल रहे हैं। लोग अपने वतन वापस जाने की कोशिश कर रहे हैं। ट्रान्सपोर्ट, बसे, ट्रेनें नहीं चल रही है, वह चलनी चाहिए। जो लोग अपने घर जा रहे, उनके मदद का कुछ अच्छा इंतजाम होना चाहिए। मगर कहीं ऐसा भी ना हो के - जो अपने घर, गांव जा रहे हैं, वह इस बीमारी को फैला रहे हैं। जो लोग बसों में बैठेंगे उनका टेस्ट होना चाहिए। अगर वह निगेटिव है तो उन्हें गांव भेजा जा सकता है। जो लोग पॉजिटिव हैं उन्हें शहर में रोककर उनका सही इलाज होना चाहिए। यह सब करना बहुत ज्यादा जरूरी है।

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कुछ रोशनीयाँ

जहां इस बीमारी के इतने डार्क साइड है, वहां कुछ हर चीजों में पॉजिटिव साइड भी देखना चाहिए, चाहे वह कैसे भी हो। आज पॉजिटिव लफ्ज़ अजीब हो गया है, पॉजिटिव से डर लगता है। नेगेटिव है तो ठीक है, अगर पॉजिटिव है तो आप मुश्किल में आ गए। लेकिन पॉजिटिव से मेरा मतलब - जिंदगी का जो बेहतर हिस्सा उससे है। हम सब के सब एक घर की छत के नीचे रहते हैं, लेकिन सब भाग रहे हैं, कोई यहां, कोई वहां, कोई इधर, कोई उधर - तो यह जो है सब खत्म होना चाहिए।

हम एक साथ घर में बैठे हैं और आपस में बाते कर रहे हैं। जो लोग एक ही घर में रहते थे, लेकिन उन्हें एक दिन में शायद 15 मिनट मिल पाते थे, अब वह थोड़ा ज्यादा समय दे पा रहे हैं। एक दूसरे के साथ बैठकर वह सारी बातें कर रहे हैं, जो पहले कभी नहीं की थी, या की भी थी तो बरसों पहले की थी। हम एक दूसरे को बेहतर समझ रहे हैं, यह भी हमारे लिए जरुरी हैं।

एक और अच्छी बात हुई है कि शहरों में आसमान थोड़ा सा नीला हो गया है। चिड़ियों कि चह-चहाहट की आवाज ज्यादा सुनाई दे रही देती है। कई शहर जहां उनके आसपास जंगले, वहां बारहसिंघे, हिरणे अब सड़कों पर आ जाते हैं। जो बिचारे जंगल के अन्दर कहीं दुबक के और सहम कर बैठे थे। ऐसे में ख्याल आता है कि कभी हम लोगों को शहरों को सांस लेने का मौका देना चाहिए। नेचर को सांस लेने का मौका देना चाहिए, ताकि वापस आसमान नीला हो जाए, दरिया साफ हो जाए।

जमुना जी के बारे में लोग बता रहे हैं उसका पानी बेहतर हुआ है, उसकी क्वालिटी अच्छी हो गई है। कुदरत को हम जितना थका देते हैं, जितना उसे निचोडते हैं, उसे सांस लेने का मौका देना चाहीए। इस लॉकडाऊन के वजह से हमे अपने घरों में है, इससे एक बात पता चली की, अगर हम कुदरत का थोड़ासा ख्याल रखें तो, हमारी जिन्दगी और ज्यादा अच्छी हो सकती है।

जितनी बुरी तरह से हम नेचर को ट्रिट कर रहे हो यह अच्छी बात नहीं है। मैं अंधविश्वासी आदमी नहीं हूं मगर कभी-कभी लगता है कि, नेचर ने उसी तरह हमो पलट कर जवाब दिया है। नेचर से अच्छे रिलेशन रहे, दोस्ती रहे यही हमारे लिए अच्छा है।

लोगों का खयाल रखिए। आपको जरा सी भी लापरवाही नही बरतनी है। अपने हाथों को धोइये, पूरी तरह एहतियात रखें। बाहर निकलने से पहले मास्क पहन कर निकले, चीजों को छुये तो फिर से हाथ धोईये। जिसे सोशल डिस्टेंसिंग कहते हैं जहां तक हो सके उसका पालन किजीए। मुझे मालूम है कि बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके जिन्दगी में सोशल डिस्टेंसिंग बहुत मुश्कील होंगा। उनका एक छोटा सा घर है जिसमें 7-8 आदमी रहते हैं, तो कहां सोशल डिस्ट्रेसिंग होगी? लेकिन जिस हद तक भी हो आप साफ-सुथरे रहीए।

हो सके तो अपना कोरोना टेस्ट भी करवा लीजिए। यह सोच कर मत टालिये कि मुझे तो कोई सिम्टम्स नहीं है। आप अपना टेस्ट करवा लीजिए, टेस्ट करना ना करवाने से बेहतर हैं। अगर अपना टेस्ट करवा लिया तो एक दूसरे के साथ ज्यादा इत्मीनान से रह सकेंगे।

मेरी शुभकामनाएं आपके साथ है। उम्मीद करता हूं कि आप अपना ख्याल रखेंगे। अपने घरवालों का और देश का खयाल रखेंगे। देश का खयाल यही है कि जो आपसे कहा जा रहा है, कैसे रहना हैं और कैसे नही रहना हैं। क्या करना हैं और क्या नही करना हैं, अगर आप इन बातों पर चलते हैं, तो आप देश से प्यार करते हैं।

बहुत, बहुत शुक्रिया...

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जावेद अख्तर

वैसे तो देश में यह नाम बहुत ही जाना-पहचाना नाम हैं। जावेद अख्तर शायर, फिल्मों के गीतकार और पटकथा लेखक तो हैं ही, सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी एक प्रसिद्ध हस्ती हैं। वे प्रगतिशील आंदोलन के संयोजक और एक अच्छे शख्स हैं।