जब मुहंमद रफी बने हिरो के फिल्में साईन करने की वजह

जब मुहंमद रफी बने हिरो के फिल्में साईन करने की वजह
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ता भारत रत्न, मुहंमद रफी क्यों नहीं?अक्सर यह सवाल शहंशाह-ए-तरन्नुम मुहंमद रफी के चाहने वाले पूछते हैं, लेकिन इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं हैं। क्यों हमने अपने इस शानदार गायक की उपेक्षा की है? ‘भारत रत्न’, तो छोड़िए सरकार ने उन्हें ‘दादा साहब फालके पुरस्कार’ के लायक भी नहीं समझा। जबकि उनसे कई जूनियरों को यह पुरस्कार अब तक मिल चुका है।

गायकी के क्षेत्र में मन्ना डे, पंकज मलिक, लता मंगेशकर और आशा भोंसले उनसे पहले यह पुरस्कार हासिल कर चुके है। जबकि मो. रफी का गायन और उनकी शख्सियत किसी भी तरह अपने समकालीन गायकों से कमतर नहीं, बल्कि कई मामलों में तो यह बेमिसाल गुलूकार उनसे इक्कीस ही साबित होगा।

फिल्मी दुनिया के अपने साढ़े तीन दशक के कैरियर में मो. रफी ने देश-दुनिया की अनेक भाषाओं में हजारों गीत गाये और गीत भी ऐसे-ऐसे लाजवाब कि आज भी इन्हें सुनकर, लोगों के कदम वहीं ठिठक कर रह जाते हैं। उनकी मीठी आवाज जैसे कानों में रस घोलती है। दिल में एक अजब सी कैफियत पैदा हो जाती है।

हिन्दी सिनेमा में प्लेबैक सिंगिंग को नया आयाम देने वाले मो. रफी की पैदाइश 24 दिसंबर, 1924 को अमृतसर (पंजाब) के पास कोटला सुलतान सिंह में हुई थी। उनके परिवार का संगीत से कोई खास सरोकार, लगाव नहीं था। मो. रफी ने खुद इस बात का जिक्र अपने एक लेख में किया था।

उर्दू के मकबूल रिसाले ‘शमां’ में प्रकाशित इस लेख में उन्होंने लिखा है, मेरा घराना मजहबपरस्त था। गाने-बजाने को अच्छा नहीं समझा जाता था। मेरे वालिद हाजी अली मुहंमद साहब निहायत दीनी इन्सान थे। उनका ज्यादा वक्त यादे-इलाही में गुजरता था। मैंने सात साल की उम्र में ही गुनगुनाना शुरू कर दिया था। जाहिर है, यह सब मैं वालिद साहब से छिप-छिप कर किया करता था।

साल 1935 में रफी के अब्बा रोजगार की तलाश में लाहौर आ गए। मो. रफी की गीत-संगीत की चाहत यहां भी बनी रही। रफी की गायकी को सबसे पहले उनके घर में बड़े भाई मुहंमद हमीद और उनके एक दोस्त ने पहचाना। इस शौक को परवान चढ़ाने के लिए, उन्होंने रफी को बकायदा संगीत की तालीम दिलाई।

उस्ताद अब्दुल वाहिद खान, उस्ताद उस्मान, पंडित जीवन लाल मट्टू, फिरोज निजामी और उस्ताद गुलाम अली खां जैसे शास्त्रीय संगीत के दिग्गजों से उन्होंने गीत-संगीत का ककहरा सीखा। राग-रागनियों पर अपनी कमान बढ़ाई। जो आगे चलकर फिल्मी दुनिया में उनके बहुत काम आया। आलम यह था कि मुश्किल से मुश्किल गाना, वे सहजता से गा लेते थे।

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सिफारिशी चिट्ठी नौशाद के पास

मुहंमद रफ़ी ने अपना पहला नगमा साल 1941 में महज सतरह साल की उम्र में एक पंजाबी फ़िल्म ‘गुल बलोच’ के लिए रिकोर्ड किया था, जो साल 1944 में रिलीज हुई। इस फिल्म के संगीतकार थे श्याम सुंदर और गीत के बोल थे, ‘सोनिये नी, हीरिये ने’। संगीतकार श्याम सुंदर ने ही मो. रफी को हिन्दी फिल्म के लिए सबसे पहले गवाया। फिल्म थी ‘गांव की गोरी’, जो साल 1945 में रिलीज हुई।

उस वक्त भी हिन्दी फिल्मों का मुख्य केन्द्र बम्बई ही था। लिहाजा अपनी किस्मत को आजमाने मो. रफी बम्बई पहुंच गए। उस वक्त संगीतकार नौशाद ने फिल्मी दुनिया में अपने पैर जमा लिए थे। उनके वालिद साहब की एक सिफारिशी चिट्ठी लेकर मो. रफी, बेजोड़ मौसिकार नौशाद के पास पहुंचे।

नौशाद साहब ने रफी से शुरुआत में कोरस से लेकर कुछ युगल गीत गवाए। फ़िल्म के हीरो के लिए आवाज़ देने का मौक़ा उन्होंने रफ़ी को काफ़ी बाद में दिया। नौशाद के संगीत से सजी अनमोल घड़ी’ (1946) वह पहली फिल्म थी, जिसके गीत ‘तेरा खिलौना टूटा’ से रफी को काफी शोहरत मिली।

इतिहास गवाह है कि इस जोड़ी ने एक के बाद एक कई सुपर हिट गाने दिए। ‘शहीद’, ‘दुलारी’, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘दास्तान’, ‘उड़नखटोला’, ‘कोहिनूर’, ‘गंगा जमुना’, ‘मेरे महबूब’, ‘पाकीजा’, ‘मदर इंडिया’, ‘मुगल-ए-आजम’, ‘गंगा जमुना’, ‘बाबुल’, ‘आन’, ‘कोहिनूर’ जैसी अनेक फिल्मों ने नौशाद और मो. रफी ने अपने संगीत-गायन से लोगों का दिल जीत लिया।

नौशाद के लिए मो. रफी ने तकरीबन 150 से ज्यादा गीत गाए। उसमें भी उन्होंने शास्त्रीय संगीत पर आधारित जो गीत गाए, उनका कोई मुक़ाबला नहीं। मसलन ‘मधुबन में राधिका नाचे रे’ (फिल्म कोहिनूर)

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संगीतकारों की पहली पसंद

1950 और 60 के दशक में मुहंमद रफी ने अपने दौर के सभी नामचीन संगीतकारों मसलन शंकर जयकिशन, सचिनदेव बर्मन, रवि, रोशन, मदन मोहन, गुलाम हैदर, जयदेव, हेंमत कुमार, ओ.पी नैयर, सलिल चौधरी, कल्याणजी आनंदजी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, खैयाम, आर. डी. बर्मन, उषा खन्ना आदि के साथ सैंकड़ो गाने गाए।

एक दौर यह था कि मो. रफी हर संगीतकार और कलाकार की पहली पसंद थे। उनके गीतों के बिना कई अदाकार फिल्मों के लिए हामी नहीं भरते थे। फिल्मी दुनिया में मो. रफी जैसा वर्सेटाइल सिंगर शायद ही कभी हो। उन्होंने हर मौके, हर मूड के लिए गाने गाए।

जिन्दगी का ऐसा कोई भी वाकिया नहीं है, जो उनके गीतों में न हो। मिसाल के तौर पर शादी की सभी रस्मों और मरहलों के लिए उनके गीत हैं। ‘मेरा यार बना है दूल्हा’, ‘आज मेरे यार की शादी है’, ‘बहारो फूल बरसाओ मेरा महबूब’, ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ और ‘चलो रे डोली उठाओं कहार।’

हीरो हो या कॉमेडियन सब के लिए उन्होंने प्लेबैक सिंगिंग की, लेकिन गायन की अदायगी अलग-अलग। मो. रफी के गीतों का ही जादू था कि कई अदाकार अपनी औसत अदाकारी के बावजूद फिल्मों में लंबे समय तक टिके रहे। सिर्फ गानों की बदौलत उनकी फिल्में सुपर हिट हुईं।

रफी साहब के गाने का अंदाज भी निराला था। जिस अदाकार के लिए वे प्लेबैक सिंगिंग करते, पर्दे पर ऐसा लगता कि वह ही यह गाना गा रहा है।

यकीन न हो तो भारत भूषण, दिलीप कुमार, शम्मी कपूर, देव आनंद, गुरुदत्त, राजेन्द्र कुमार, शशि कपूर, धर्मेन्द्र, ऋषि कपूर आदि अदाकारों के लिए गाये उनके गीतों को ध्यान से सुनिए-देखिए, आपको फर्क दिख जाएगा। किस बारीकता से रफी ने इन अदाकारों की एक्टिंग और उनकी पर्सनेलिटी को देखते हुए गीत गाये हैं।

मुहंमद रफी के लिए यह किस तरह से मुमकिन होता था? इस बारे में उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘किसी भी फनकार के लिए गाने की मुनासिबत से अपना मूड बदलना बहुत ही दुश्वार अमल होता है। वैसे गाने के बोल से ही पता चल जाता है कि गाना किस मूड का है। फिर डायरेक्टर भी हमें पूरा सीन समझा देता है, जिससे गाने में आसानी होती है। कुछ गानों में फनकार की अपनी भी दिलचस्पी होती है। फिर उस गीत का एक-एक लफ्ज दिल की गहराइयों से छूकर निकलता है।’

रफी साहब ने बड़े ही सरलता और सहजता से भले ही यह बात कह दी हो, लेकिन गायक-गायिका यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि यह काम इतना आसान भी नहीं।

मुहंमद रफी फिल्मी दुनिया में अपने करियर की शुरुआत में कुंदन लाल सहगल, जी. एम. दुर्रानी और तलत महमूद की गायकी के प्रशंसक रहे। शुरू की फिल्मों में उन्होंने उनकी गायन शैली को अपनाया, लेकिन बाद में अपना खुद का एक स्टाइल बना लिया। वे खुद ही दूसरे गायकों के लिए आईकॉन बन गए।

मुहंमद रफी ने कई अदाकारों के लिए तो प्लेबैक सिंगिंग की ही, पार्श्व गायक किशोर कुमार के लिए भी आठ गाने गाए। यही नहीं साल 1945 में, वे पहली बार फिल्म ‘लैला मजनू’ के एक गीत ‘तेरा जलवा जिसने देखा’ के लिए फिल्म स्क्रीन पर भी आए।

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कभी फिल्में नही देखी

रफी ने सैंकड़ों फिल्मों के लिए गाने गाये लेकिन खुद उन्हें फिल्में देखने का बिल्कुल शौक नहीं था। परिवार के साथ कभी उनकी जिद पर कोई फिल्म देखने जाते, तो फिल्म के दौरान सो जाते।

मो. रफी ने हजारों नगमें गाये, लेकिन उन्हें फिल्म ‘दुलारी‘ में गाया गीत ‘सुहानी रात ढल चुकी, न जाने तुम कब आओगे।’ बहुत पसंद था। यह उनका पसंदीदा गीत था।

1970 के दशक में मो. रफी ने कई लाइव संगीत कार्यक्रमों में अपने गीतों का प्रदर्शन किया। इसके लिए वे पूरी दुनिया घूमे। मुहंमद रफी के यह सभी लाइव शो कामयाब साबित हुए। दुनिया भर में फैले मो. रफी के प्रशंसक उनके गीतों के जैसे दीवाने थे। आज भी अपने देश से ज्यादा उनके प्रशंसक, पूरी दुनिया में फैले हुए हैं। ऐसी शोहरत बहुत कम लोगों को नसीब होती है।

मुहंमद रफी अपने गायन की वजह से अनेक पुरस्कार और सम्मानों से नवाजे गए। हिन्दी सिनेमा के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘फिल्म फेयर’ अवार्ड के लिए उन्हें 16 बार नॉमिनेट किया गया और छह बार उन्हें यह पुरस्कार मिला। जिसमें भी साल 1961, 1968, 1977, 1979 और 1980 में उनके एक से ज्यादा गाने इस पुरस्कार के लिए नॉमिनी थे। छह बार उन्हें सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला।

वहीं क्या हुआ तेरा वादा’ के लिए ही रफ़ी को पहली बार सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। 1965 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा। साल 1980 में अपनी मौत से ठीक दो पहले फिल्म मो. रफी ने फिल्म ‘आस-पास’ के लिए आखिरी गाना रिकॉर्ड किया था।

मो. रफी को इस दुनिया से गुजरे चार दशक हो गए, लेकिन फिल्मी दुनिया में उन जैसा कोई दूसरा गायक नहीं आया। इतने लंबे अरसे के बाद भी वे अपने चाहने वालों के दिलों पर राज करते हैं। हिन्दी गीतों की दुनिया में कई मौसम आए और चले गए, लेकिन मो. रफी का मौसम अभी भी जवां है। वे सदाबहार थे, सदाबहार हैं और आगे भी रहेंगे।

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ज़ाहिद ख़ान

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और आलोचक हैं। कई अखबार और पत्रिकाओं में स्वतंत्र रूप से लिखते हैं। लैंगिक संवेदनशीलता पर उत्कृष्ठ लेखन के लिए तीन बार ‘लाडली अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है। इन्होंने कई किताबे लिखी हैं।