इतिहास लिखने ‘जंग ए मैदान’ जाते थे अमीर ख़ुसरो

इतिहास लिखने ‘जंग ए मैदान’ जाते थे अमीर ख़ुसरो

मीर खुसरो सन् 1286 ईसवीं में अवध के गवर्नर (सूबेदार) खान अमीर अली उर्फ हातिम खां के यहां दो साल तक रहे। यहां खुसरो ने इन्हीं अमीर के लिए अस्पनामाउनवान से किताब लिखी।

खुसरो लिखते हैं, वाह क्या शादाब सरजमीं है ये अवध की। दुनिया जहान के फल-फूल मौजूद। कैसे अच्छे मीठी बोली के लोग। मीठी वरंगीन तबियत के इन्सान। धरती खुशहाल जमींदार मालामाल। अम्मा का खत आया था। याद किया है। दोमहिने हुए पांचवा खत आ गया।

अवध से जुदा होने को जी तो नहीं चाहता मगर देहली मेरा वतन, मेरा शहर, दुनिया का अलबेला शहर और फिर सबसे बढ़कर मां का साया, जन्नत की छांव। उफ्फ दो साल निकल गए अवध में। भई बहुत हुआ। अब मैं चला। हातिम खां दिलो जान से तुम्हारा शुक्रिया मगर मैं चला। जरो-माल पाया, लुटाया, खिलाया, मगर मैं चला। वतन बुलाता है धरती पुकारती है।

अब तक अमीर खुसरो की जबा़न में बृज व खडी़ (देहलवी) बोली के अलावा पंजाबी, बंगला और अवधी की भी चाश्नी आ गई थी।

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दिल्ली में मिला ऐजाज

सन् 1288 ईसवीं में खुसरो दिल्ली आ गए और बुगरा खां के नौजवान बेटे कैकुबाद के दरबार में बुलाए गए। कैकुबाद का बाप बुगरा खां बंगाल का गवर्नर था। जब उसने सुना कि कैकुबाद गद्दी पर बैठने के बाद अय्याश और बागी हो गया है तो उसने अपने बेटे को सबक सिखाने के लिए दिल्ली कूच किया, लेकिन इसी बीच अमीर खुसरो ने दोनों के दरम्यान सुलह़ करा दी।

खुशी में कैकुबाद ने खुसरो को ऐजाज़ से नवाज़ा। खुसरो ने इसी ज़मीन में किरानुस्सादैन नाम से एक मसनवी लिखी जो 6 माह में पूरी हुई। (688 हिजरी)। इसमें उस वक्त केदेहली की इमारते, मौसिकी वगैरह का जिक्र किया गया है। इसमें दिल्ली की खासतौर पर तारीफ की गई है इसलिए इसे मसनवी दर सिफत-ए-देहलीभी कहते है। इसमें शेरों की भरमार है।

अमीर खुसरो अपनी इस मसनवी में लिखते हैं कि कैकुबाद को उनके पीर/गुरू निजामुद्दीन औलिया का नाम भी सुनना पसंद नही था। खुसरो आगे लिखते हैं, क्या तारीखी वाकया हुआ। बेटे ने अमीरों की साजिश से तख्त हथिया लिया, बाप सेजंग को निकला। बाप ने तख्त उसी को सुपुर्द कर दिया। बादशाह का क्य़ा? आज है कल नहीं।

ऐसा कुछ लिख दिया है कि आज भी लुत्फ दे और कल भी जिन्दा रहे। अपने दोस्तों, दुश्मनों की, शादी की, गर्मी की, मुफलिसोंऔर खुशहालों की, ऐसी-ऐसी रंगीन, तस्वीरें मैंने इसमें खेंच दी है कि रहती दुनिया तक रहेंगी। कैसा इनाम? कहां के हाथी-घोडे़?

मुझे तो फिक्र है कि इस मसनवी में अपने पीरो मुरशिद हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन काजिक्र कैसे पिरोऊंमेरे दिल के बादशाह तो वही हैं और वही मेरी इस नज्म में न हों, यह कैसे हो  सकता है? ख्वाजा से बादशाह ख़फा है, नाराज हैं, दिल में गांठ है, ये न जलता है।

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सल्तनतों  से रहे दूर

ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया ने शायद इसी ख्याल से उस दिन कहा होगा कि देखा खुसरो, ये न भूलो कि तुम दुनियादार भी हो, दरबार सरकार से अपनी सिलसिला बनाए रखो। मगर दरबार  से सिलसिला क्या हैसियत इसकी। तमाशा है, आज कुछ कल कुछ।

खुसरो को किरानुस्सादैन मसनवी पर मलिकुश्ओरा ऐजाज से नवाजा गया। सन् 1290 में कैकुबाद मारा गया और गुलाम सल्तनत का खात्मा हो गया।

अमीर खुसरो की ग़ज़लो मैं ग़ज़ब की चाशनी होती थी, लेकिन इसके बावजूद भी खुसरो तसव्वुफ़ ले अपने कलाम से पूरी तरह इन्साफ करते। खुसरो मज़हबी शख्स थे। इन्हीं के एक कसीदे से यह पता चलता है कि वो नमाज़ पढते थे तथा रोज़ा रखते थे। शराब नही पीते थे और न ही उसके आदी थे।

बादशाहों की अय्याशी से उन्होंने अपने दामन को सदा बचाए रखा। वो दिल्ली में बिल नाग़ा निजामुद्दीन औलिया साहब की ख़ानक़ाह मे जाते थे फिर भी वे ख़ालिस सूफ़ी नहीं थे। वे गाते थे, नाचते थे, हंसते थे, गाना सुनते और दाद देते थे। शाहों और शहजादों की शराब-महफिलों में हिस्सा जरूर लेते थे। मगर हाज़िरी कि हद तक। मगरतटस्थ भाव से।

जियाउद्दीन बरनी का कहना है, खुसरो अब तक अपने जीवन के 38 बंसत देख चुके थे। इस बीच मालवा में चितौंड़ में रणथम्भोर में बगावत की खबर बादशाह जलालुद्दीन को एक सिपाही ने ला कर दी। बग़ावत को कुचालने के लिए बादशाह ख़ुद मैदाने जंग में गया।

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लिखी आंखों देखी

बादशाह ने जंग मैं जाने से पहले भरे दरबार में ऐलान किया- हम जंग को जाएगें। तलवार और साजों की झंकार भी साथ जाएगी। कहां है वो हमारा हुदहुद। वो शायर, वो भी हमारे साथ रहेगा साये की तरह। क्यों खुसरो?

खुसरों उठ खडे़ हुए और बोले, ‘जी हुजूर। आपका हुदहुद साये की तरह साथ जाएगा। जब हुक्म होगा चहचहाएगा सरकार। जब तलवार और पानी दोनों की झंकार थम जाती है, जम जाती है तब शायर का नगमा गूंजता है, कलम की सरसराहट सुनाई  देती है। अब जो मैं आंखों देखी लिखूंगा वो कल सैकडों साल तक आने वाली आंखें देखेंगी हूजूर।

बादशाह खुश हुए और बोले, “शाबाश खुसरो। तुम्हारी बहादुरी और निडरता के क्या कहनें। मैदाने जंग और महफिलें रंग में हरदम मौजूद रहना। तुम को हम अमीर का ओहदा देते है। तुम हमारे मनसबदार हो। बारह सौ तनगा  सालाना आज से तुम्हारी तन्ख्वाह होगी।

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क़ुरबान अली

लेखक त्रिभाषी (हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी) पत्रकार हैं, जिनके पास सभी पारंपरिक मीडिया जैसे टीवी, रेडियो, प्रिंट और इंटरनेट में 35 से अधिक सालों का अनुभव है। वह पीआईबी, भारत सरकार और भारत की संसद द्वारा मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं।